BK Murli today in Hindi

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Monday, 16 July 2018

July 16, 2018

‌BK murli today 17/07/2018 (Hindi) Brahma Kumaris Murli प्रातः मुरली Om Shanti.Shiv baba ke Mahavakya

BK Murli Today  17 July 2018 (Hindi)


17/07/2018 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन
''मीठे बच्चे - पावन बनने के लिए अपने स्वधर्म में रहो और अशरीरी बन एक बाप को याद करो''

प्रश्नः-   
किस विधि से नये स्टूडेन्ट्स पर ज्ञान का रंग लग सकता है?
BK Murli Today  17 July 2018 (Hindi)

उत्तर:-  
उन्हें पहले-पहले सात रोज़ की भट्ठी में बिठाओ। कायदा है - जब कोई भी आता है तो उनसे फार्म भराओ। पहले सात रोज़ भट्ठी में पड़े तब पूरा रंग लगे। तुम भ्रमरियां ज्ञान की भूँ-भूँ कर आप समान बनाती हो। तुम जानती हो - अभी देवता धर्म की सैपलिंग लग रही है। जो इस घराने की आत्मायें होंगी वह महा-रोगी से निरोगी बनने के पुरुषार्थ में लग जायेंगी।

गीत:-   
महफिल में जल उठी शमा........

ओम् शान्ति।

बच्चों को ओम् शान्ति का अर्थ तो समझाया हुआ है। ओम् अर्थात् अहम्। अहम् कौनआत्मा और मेरा शरीर कर्मेन्द्रियाँ। आत्मा का स्वधर्म है ही साइलेन्स। आत्मा किसकी सन्तान है?कहेंगे परमपिता परमात्मा की। वह भी साइलेन्स है। आत्मायें साइलेन्स वर्ल्ड शान्तिधाम में रहती हैं। फिर पार्ट बजाने टॉकी वर्ल्ड में आती हैं। अब बेहद का बाप कहते हैं - हे बच्चेअपने स्वधर्म में रहो। अशरीरी होकर बैठो। बाप को याद करो। उस बाप को शमा भी कहते हैं। अब यह है महफिल पतित मनुष्यों की। इस समय यह पतित दुनिया है। मनुष्य मात्र पतित हैं। समझाया गया है - सतयुग में भारत पावन था। गृहस्थ धर्म कहा जाता हैजिसको सुखधाम कहते हैं। भारत पावन थाअभी पतित है। दु:खधाम है। यह चक्र फिरता रहता है। अभी यह है कल्याणकारी संगमयुग,जबकि पतित मनुष्य-सृष्टि पर बाप को आना पड़ता है - पतित मनुष्य सृष्टि को पावन बनाने। पुरानी दुनिया से नई दुनिया बाप रचता ही बनाते हैंजिसको परमपिता परमात्मा कहा जाता है। सब भक्तों का भगवान् एक है। तो बाप कहते हैं - मुझे भी पतित दुनियापतित शरीर में आना पड़ता है। परमधाम से एक ही बार आता हूँ - भारत को पावन दैवी राज्य बनाने। इस वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी को कोई नहीं जानते क्योंकि सब नास्तिक हैं। एक भी आस्तिक मनुष्य नहीं। बाप को न जानने के कारण निधन के बन पड़े हैं। आपस में लड़ते-झगड़ते रहते हैं। घर-घर में कितनी अशान्ति है! सतयुग आदि में वन ऑलमाइटी अथॉरिटी देवी-देवता राज्य थासुखधाम था फिर दु:खधाम कैसे बना - यह कोई नहीं जानते।

ज्ञान है ब्रह्मा का दिन। भक्ति है ब्रह्मा की रात। सन्यासी लोग कहते हैं - ज्ञान,भक्ति और वैराग्य। अब वह तो घरबार छोड़ जंगलों में चले जाते हैं। वैराग्य आ जाता है। वह है रजोगुणी सन्यासयह है सतोप्रधान सन्यास। इस पाप आत्माओं की दुनिया में एक भी पुण्य आत्मा नहीं। तो यह खेल सारा भारत पर है। भारत सोने की चिड़िया था। भारत में सोना और हीरे बहुत अथाह थे। सोने के महल बनते थे और हीरे-जवाहरों की जड़त होती थी। अभी तो भारत कौड़ी जैसा बना हुआ है। फिर उनको हीरे जैसा बाप ही बनाते हैं। तुम जानते हो - हम मनुष्य से देवता बन रहे हैं। अभी वह बाप पतितों की महफिल में आये हैं। मनुष्य समझते हैं - पतित-पावनी गंगा हैस्नान करने जाते हैं। फिर भी कोई पाप आत्मा से पुण्य आत्मा नहीं बनते। फिर साल बाई साल जाकर गंगा स्नान करते हैं। इस समय कोई भी पावन नहीं है। जब तक पावन बनाने वाला बाप न आये तब तक पावन बन न सकें। पावन बनाते हैं गीता का भगवान्। वह भगवान् तो सभी आत्माओं का बाप एक ही है। ऐसे नहीं कि सब भक्त भगवान् हैं वा सर्वव्यापी भगवान् है। यह तो भगवान् की ग्लानी करते हैं इसलिए यदा यदाहि........ यह भारत के लिए ही गाया हुआ है। जो बाप आकर भारत को हीरे जैसा बनाते हैं उनकी कितनी निंदा करते हैं। ऋषि-मुनि फिर कहते आये - रचता और रचना बेअन्त है अथवा नेती-नेती हैहम नहीं जानते। और आजकल के मनुष्य फिर कह देते सर्वव्यापी है। बाप कहते हैं - ऐसे जब बन जाते हैं तब मैं आकर पाप आत्मा से पुण्य आत्मादेवता बनाता हूँ। सबका सद्गति दाता है ही एक। वही आकर पतित से पावन बनाए लायक बनाते हैं। बच्चों को वर्सा देते हैं। लौकिक बाप से मिला है अल्पकाल का वर्सा। बेहद का बाप कहते हैं - मैं तुमको 21जन्मों लिए वर्सा देता हूँ पवित्रताशान्ति और सुख काजो लौकिक बाप दे न सके। वह बाप भी हैशिक्षक भी हैज्ञान का सागर भी है। बाप की महिमा बड़ी ऊंच हैमनुष्य सृष्टि का बीजरूप भी है। यह मनुष्य सृष्टि का वैरायटी धर्मों का झाड़ है। आदि सनातन देवी-देवता धर्म है सतयुग का। उनसे फिर और धर्म इमर्ज होते हैं। अभी तुम ब्राह्मण धर्म के बने हो। इनसे पहले शूद्र धर्म के थे। अभी ब्राह्मण से फिर सो देवता फिर सो क्षत्रिय बनेंगे। यह 84 का चक्र लगाना पड़ता है। सतयुग में भी पहले-पहले तुम आयेंगे। गाया भी जाता है - आत्मा परमात्मा अलग रहे........। गीत में भी सुना - चारों तरफ लगाये फेरे फिर भी हरदम दूर रहे अर्थात् बाप से मिल न सके।
अभी है रावण राज्य। राम राज्य है डीटी राज्य। मनुष्य तो समझते हैं - स्वर्ग-नर्क यहाँ ही है। परन्तु ऐसे हो नहीं सकता। मनुष्य मरता है तो कहते हैं स्वर्गवासी हुआ तो जरूर नर्क में था। तो जरूर पुनर्जन्म नर्क में ही लेना पड़े। मनुष्यों की तो अनेक मतें हैं। एक न मिले दूसरे से। अनेक प्रकार की द्वेत मतें हैं। आधा कल्प भारत में होती है दैवी मत। अब है आसुरी मत। भारतवासी जिस भगवान् को याद करते हैंउस पारलौकिक बाप को तो जानना चाहिए ना। अभी भारत कौड़ी मिसल है। उनको हीरे जैसा बनाना है। गांधी अथवा नेहरू भी चाहते थे - भारत में वर्ल्ड आलमाइटी अथॉरिटी रामराज्य हो। समझते हैं - कोई समय भारत में थाअभी नहीं है इसलिए रामराज्य की कोशिश करते हैं। परन्तु यह कोई मनुष्य के हाथ में नहीं है। तुम हो ब्राह्मणप्रजापिता ब्रह्मा की सन्तान। निराकार आत्मायें हैं परमपिता परमात्मा की सन्तान। वर्सा है ब्रह्माकुमार कुमारियों को। ब्रह्मा को भी वर्सा शिवबाबा से मिलता है। यह भी भाई हो गया। बच्चे सब हैं भाई-भाई तो जरूर एक बाप है सब आत्माओं का। अभी तुम ब्रह्मा की मुख वंशावली ब्राह्मण आपस में भाई-बहन ठहरे। तुमको वर्सा मिलता है दादे से। दादे के वर्से पर सभी आत्माओं का हक है। चाहे स्त्रीचाहे पुरुष के चोले में हो। लौकिक दादे का वर्सा सिर्फ बच्चों को मिलता है। यह तो बेहद का बाप है ना। भारतवासियों को सतयुग-त्रेता में बेहद के बाप से 21 पीढ़ी का बहुत सुख मिला हुआ है। तुम 84 के चक्र को अभी समझ गये हो। बाप कहते हैं - मैं गाइड बनकर आया हूँ तुम सबको ले जाने। तुम ही पहले-पहले आये थे। अभी लास्ट में भी तुम हो। फिर पहले-पहले तुम ही मनुष्य से देवता बनने वाले हो। देवी-देवता धर्म वाले ही 84 जन्म लेते हैं। फिर नम्बरवार सबके कम जन्म होते जाते हैं। और धर्म वालों के जरूर कम जन्म होंगे। अभी वह आदि सनातन देवी-देवता धर्म नहीं है। फिर से स्थापन हो रहा है। तुम जानते हो इब्राहम फिर कब आयेगाक्राइस्ट कितने समय बाद आयेगायह वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी मनुष्य ही तो जानेंगे ना। बाप समझाते हैं - जब सभी पाप आत्मा बन जाते हैं तब मैं आकर पुण्य आत्मा बनाता हूँ। जो कल्प पहले बने थे उनका सैपलिंग लगा रहा हूँ। सतयुग में था ही एक धर्म। अभी तो कलियुग में अनेक धर्म हैं। पतित आत्माओं की महफिल है। बाप आते हैं सबको पावन बनाने। सद्गति देने वाला वही एक है। माया रावण दुर्गति करती है इसलिए देवताओं के आगे जाकर गाते हैं - मैं निर्गुण हारे में कोई गुण नाहीं। बाप आकर पतित से पावन बनाए दैवी गुणों वाला बनाते हैं। अभी तुम दैवी गुण धारण करते जाते हो। फिर भारत में दैवी राज्य बन जायेगा। अभी यह दुनिया बदल रही है।
तुम हो बेहद के सन्यासी। उन्हों का है हद का वैराग्य। यह है बेहद का वैराग्य। तुम सारी पुरानी सृष्टि को भूल अपने बाप को याद कर वर्सा लेते हो। बाप कहते हैं - मुझे याद करेंगे तो उस याद अथवा योग अग्नि से विकर्म विनाश होंगे। फिर तुम विकर्माजीत बनेंगे। बाबा ने समझाया है - जब कोई 4-5 इकट्ठे आते हैं तो फार्म अलग अलग भराओ। तो मालूम पड़े कि वह किस धर्म का हैअनेक धर्मअनेक मतें हैं ना। देवी-देवता धर्म वालों को ही तीर लगेगा। कराची में हमेशा अलग-अलग समझाते थे। फार्म भराने का कायदा भी जरूरी है। 7 रोज़ भट्ठी में पड़ना पड़े क्योंकि महारोगी बन पड़े हैं। (भ्रमरी का मिसाल) तुम बच्चे भ्रमरियाँ हो। भूँ-भूँ कर आप समान बनाना पड़ता है। देवता धर्म वालों की ही सैपलिंग लगेगी। बच्चों को युक्तियाँ भी सीखनी है। बोलो - सात रोज़ जब समझो तब मुलाकात हो सकेगी और तुम पर रंग भी तब लगेगा। तुम सभी ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ हो। मनुष्य इतना भी नहीं पूछते इतने ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ क्या हैंकौन हैंअरेप्रजापिता ब्रह्मा की सन्तान तो जरूर ब्रह्माकुमार-कुमारियाँ कहेंगे ना। क्रिमिनल एसाल्ट हो न सके। यह है राजयोगगॉड फादरली युनिवर्सिटी। भगवानुवाच - मैं तुमको राजाओं का राजा बनाता हूँ। अच्छा -

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) विकर्माजीत बनने के लिए सारी पुरानी दुनिया से बेहद का वैराग्य कर,इसे भूल एक बाप की याद में रहना है।
2) भ्रमरी मिसल ज्ञान रंग लगाने की सेवा करनी है। युक्ति से महारोगियों को निरोगीनास्तिक को आस्तिक बनाना है।

वरदान:-  
परमात्म प्यार की छत्रछाया में सदा सेफ रहने वाले दु:खों की लहरों से मुक्त भव
जैसे कमल पुष्प कीचड़ पानी में होते भी न्यारा रहता है। और जितना न्यारा उतना सबका प्यारा है। ऐसे आप बच्चे दु:ख के संसार से न्यारे और बाप के प्यारे हो गये,यह परमात्म प्यार छत्रछाया बन जाता है। और जिसके ऊपर परमात्म छत्रछाया है उसका कोई क्या कर सकता! इसलिए फ़खुर में रहो कि हम परमात्म छत्रछाया में रहने वाले हैंदु:ख की लहर हमें स्पर्श भी नहीं कर सकती।

स्लोगन:- 
जो अपने श्रेष्ठ चरित्र द्वारा बापदादा तथा ब्राह्मण कुल का नाम रोशन करते हैं वही कुल दीपक हैं।
मातेश्वरी जी के महावाक्य
1. "परमात्मा एक है बाकी सर्व मनुष्य आत्मायें हैं"
अब यह तो सारी दुनिया जानती है कि परमात्मा एक है वो सर्वशक्तिवान है,जानीजाननहार हैऐसे तो सारी दुनिया खुद भी कहती है हम परमात्मा की सन्तान हैं। परमात्मा एक हैभल कोई धर्म वाला हो वो भी परमात्मा को ही मानते हैं। वो भी अपने को परमात्मा द्वारा भेजा हुआ सन्देशवाहक समझते हैं,ऐसे ही सन्देश लेकर अपने अपने धर्म की स्थापना करते हैं। जैसे गुरुनानक ने भी परमात्मा की इतनी बड़ाई की एकोंकार सत् नाम। एकोंकार का अर्थ है परमात्मा एक है। सत् नाम अर्थात् उसका नाम सत्य है तो गोया परमात्मा नाम रूप वाला भी हैअविनाशी है,अकालमूर्त भी है तो फिर कर्ता पुरुष भी है माना वो खुद अकर्ता होते हुए भी कैसे ब्रह्मा तन द्वारा कर्ता पुरुष भी बनता है। अब यह सारी महिमा एक परमात्मा की हैअब मनुष्य इतना समझते हुए फिर भी कहते हैं ईश्वर सर्वत्र है। अहम् आत्मा सो परमात्मा हैअगर सभी परमात्मा ठहरे फिर एकोंकार ....यह महिमा किस परमात्मा की करते हैंइससे सबूत है कि परमात्मा एक है।
2- "डायरेक्ट ईश्वरीय ज्ञान से सफलता"
यह जो अपने को अविनाशी ज्ञान मिल रहा है वो डायरेक्ट ज्ञान सागर परमात्मा द्वारा मिल रहा है। इस ज्ञान को हम ईश्वरीय ज्ञान कहते हैं क्योंकि इस ज्ञान से मनुष्य आदि मध्य अन्त सुख पाते हैं अर्थात् जन्म-जन्मान्तर दु:ख के बंधन से छूट जाते हैं। कर्मबन्धन में नहीं आते इसीलिए ही इस ज्ञान को अविनाशी ज्ञान कहा जाता है। अब यह ज्ञान सिर्फ एक ही अविनाशी परमपिता परमात्मा द्वारा हमें प्राप्त होता है क्योंकि वो खुद अविनाशी है। बाकी तो सब मनुष्य आत्मायें जन्म मरण के चक्र में आने वाली हैं इसलिए उनसे मिला हुआ ज्ञान हमें कर्मबन्धन से छुटकारा देने वाला नहीं है। इस कारण उन्हों के ज्ञान को मिथ्या ज्ञान अथवा विनाशी ज्ञान कहेंगे। लेकिन यह देवतायें सदा अमर हैं क्योंकि इन्होंने अविनाशी परमात्मा द्वारा यह अविनाशी ज्ञान प्राप्त किया हैतो इससे साबित है कि परमात्मा भी एक है तो उसका ज्ञान भी एक हैइस ज्ञान में दो मुख्य बातें बुद्धि में रखनी हैंएक तो इसमें विकारी कलियुगी संगदोष से दूर होना है और दूसरी बात कि मलेच्छ खान-पान आदि की परहेज़ रखनी है। इस परहेज रखने से ही जीवन सफल होती है। अच्छा। ओम् शान्ति।
July 16, 2018

‌BK murli today 17/07/2018 (English) Brahma Kumaris Murli प्रातः मुरली Om Shanti.Shiv baba ke Mahavakya

BK Murli Today  17 July 2018 (ENGLISH)


17/07/18 Morning Murli Om Shanti BapDada Madhuban


Sweet children, in order to become pure, stay in your original religion, become bodiless and remember the one Father.

Question:
With what method can you colour new students with the colour of knowledge?

Answer:  
First of all make them sit in a bhatti (furnace) for seven days. It is the custom, when anyone comes, to make them fill in a form. Only when they first stay in a bhatti for seven days can they be coloured fully. You buzzing moths buzz knowledge and make them the same as yourselves. You know that the sapling of the deity religion is now being planted. Those who are the souls of this clan will become engaged in the effort of changing from being greatly diseased to becoming free from disease.
BK Murli Today  17 July 2018 (ENGLISH)

Song:     
The Flame has ignited in the gathering for the moths…


Om shanti.

The meaning of ‘Om shanti’ has been explained to you children. ‘Om’ means I am. Who am I? I am a soul, and my body, the physical organs. The original religion of a soul is silence. Whose child is a soul? It would be said: A soul is a child of the Supreme Father, the Supreme Soul. He too is silence. Souls reside in the silence world, the land of peace. Then, in order to play their part s, they enter the talkie world. The unlimited Father now says: O children, stay in your original religion. Sit in a bodiless stage. Remember the Father. That Father is also called the Flame. This is the gathering of impure human beings. At this time, the world is impure. All human beings are impure. It has been explained that Bharat was pure in the golden age. It was then the pure household religion and called the land of happiness. Bharat was pure and is now impure; it is the land of sorrow. This cycle continues to turn. This is now the beneficial confluence age when the Father has to come into the impure human world in order to make it pure. Only the Father, who is called the Supreme Father, the Supreme Soul, the Creator, makes the old world into a new world. The God of all devotees is One. The Father says: I too have to enter the impure world and an impure body. I only come once from the supreme abode to make Bharat into the pure deity kingdom. No one knows the history and geography of this world because all are atheists. Not a single human being is a theist. Because of not knowing the Father, they have become orphans. They continue to fight and quarrel among themselves. So much peacelessness exists in every home. At the beginning of the golden age, there was the one Almighty Authority deity kingdom. It was the land of happiness. No one knows how that became the land of sorrow. Knowledge is the day of Brahma and devotion is the night of Brahma. Sannyasis speak of knowledge, devotion and disinterest. They leave their homes and families and go away into the forests. They have disinterest. Their renunciation is rajoguni whereas this renunciation is satopradhan. In this world of sinful souls, there isn't a single charitable soul. So, this whole play is based on Bharat. Bharat was the Golden Sparrow. There used to be plenty of gold and diamonds in Bharat. Golden palaces were built and they were studded with diamonds and jewels. Bharat has now become like a shell. Only the Father makes it like diamonds. You know that you are changing from human beings into deities. That Father has now come into the gathering of impure ones. People believe that the Ganges is the Purifier and so they go there to bathe in that. In spite of that, no one has become a charitable soul from a sinful soul. They still continue to go to bathe there year after year. At this time, no one is pure. No one can become pure until the Father who purifies everyone comes. The God of the Gita makes you pure. That God is the one Father of all souls. It isn't that all devotees are God or that God is omnipresent. That is defamation of God and this is why it is said: I come whenever there is extreme irreligiousness. This is sung about Bharat. People defame the Father so much, the One who comes and makes Bharat like a diamond. Rishis and munis have been saying: “The Creator and His creation are infinite”, that is, “neither this nor that” (neti, neti); “we do not know”, whereas people today have been saying that God is omnipresent. The Father says: When they become like that, I come and change sinful souls into charitable souls, into deities. The Bestower of Salvation for All is One. He Himself comes and makes the impure ones pure and makes them worthy. He gives you children the inheritance. You have been receiving temporary inheritances from your physical fathers. The unlimited Father says: I give you the inheritance of purity, peace and happiness for 21 births. No physical father can give you this. He is the Father, Teacher and also the Ocean of Knowledge. The praise of the Father is very elevated. He is the Seed of the human world tree. This is the tree of the variety of religions of the human world. The original, eternal, deity religion is the religion of the golden age. Then other religions emerge from that. You now belong to the Brahmin religion. Prior to that, you belonged to the shudra religion. Now, from Brahmins, you will become deities and then warriors. You have to go around the cycle of 84 births. You are the first ones to come into the golden age. It is sung: Souls remained separated from the Supreme Soul for a long time. You also heard in the song: We went around in all four directions and yet always remained distant, that is, we couldn't meet the Father. It is now the kingdom of Ravan. The kingdom of Rama is the deity kingdom. People believe that both heaven and hell are here now. However, that is not possible. When someone dies, people say that he has become a resident of heaven. Therefore, he was surely in hell. So he also has to take rebirth in hell. People have so many different ideas: one cannot be the same as another. There are so many conflicting ideas. For half the cycle, there are the divine directions in Bharat. Now, there are devilish directions. The people of Bharat should know that Father from beyond, that is, the God whom they remember. Bharat is now like a shell. It has to be made like a diamond. Gandhiji and Nehru wanted there to be the World Almighty Authority kingdom of Rama in Bharat. They believed that it was like that at some point in Bharat. It doesn't exist now. This is why they tried to bring about the Kingdom of Rama. However, that is not in the hands of human beings. You are Brahmins, children of Prajapita Brahma. Incorporeal souls are children of the Supreme Father, the Supreme Soul. The inheritance is for Brahma Kumars and Kumaris. Brahma too receives his inheritance from Shiv Baba. This one is also your brother. All the children are brothers and so there is surely one Father of all souls. Now, you mouth-born Brahmins, you children of Brahma, are brothers and sisters. You receive your inheritance from the Grandfather. All souls, whether they are in male or female costumes, have a right to their Grandfather's inheritance. Only sons receive an inheritance from a physical grandfather. That One is the unlimited Father. In the golden and silver ages, the people of Bharat received a lot of happiness for 21 generations from the unlimited Father. You have now understood the cycle of 84 births. The Father says: I have come as your Guide to take all of you back. You are the ones who come here first, and you are the ones who are here at the end and you are then the first ones who become deities from human beings. Only those who belong to the deity religion take 84 births. Then, numberwise, everyone continues to take fewer births. Those of other religions will definitely take fewer births. That original, eternal, deity religion doesn't exist now; it is being established once again. You know when Abraham will come again and how long after him Christ will come. Only human beings would know the world history and geography. The Father explains: When all souls become sinful, I come and make them charitable. I am planting the sapling of those who became this in the previous cycle. There was just the one religion in the golden age. Now, in the iron age, there are innumerable religions. There is the gathering of impure souls. The Father comes to purify everyone. He alone is the One who grants salvation. Maya, Ravan brings degradation. This is why they sing in front of the deity idols: I am without virtue, I have no virtues. The Father comes and makes impure ones pure and changes them into those who have divine virtues. You are now continuing to imbibe divine virtues. Then there will be the deity kingdom in Bharat. This world is now changing. You are unlimited sannyasis. Their renunciation is limited, whereas this renunciation is unlimited. You forget the whole of the old world and remember your Father and claim your inheritance. The Father says: If you remember Me, then, through that remembrance, that is, through the fire of yoga, your sins will be absolved and you will become conquerors of sinful actions. Baba has explained that when a group of four or five people come, get each one to fill in a form individually, so that you can tell which religion each one belongs to. There are innumerable religions and innumerable directions. The arrow will only strike those who belong to the deity religion. In Karachi, they always explained to each one individually. The custom of getting them to fill in a form is necessary. They also have to sit in a furnace for seven days because they are greatly diseased. You children are buzzing moths. You have to buzz knowledge and make others the same as yourselves. Only the sapling of those of the deity religion will be planted. You children have to learn different tactics. Tell them: When you first understand this for seven days, you will be able to meet Baba and you will then be coloured. All of you are Brahma Kumars and Kumaris. People don't even ask what all you Brahma Kumars and Kumaris are about or who you are. Oh! but the children of Prajapita Brahma would surely be called Brahma Kumars and Kumaris, would they not? There cannot be any criminal assault. This is Raja Yoga; it is the God f atherly University. God speaks: I make you into kings of kings. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.

Essence for dharna:
In order to become a conqueror of sinful actions, have unlimited disinterest in the whole of the old world. Forget it and stay in remembrance of the one Father.
Serve like a buzzing moth to colour others with knowledge. Be tactful in making those who are greatly diseased free from disease and atheists into theists.

Blessing: 
May you remain constantly safe and free from any waves of sorrow by staying under the canopy of God’s love.
A lotus grows in dirty water and yet is detached from it. The more detached it is, the more it is loved by everyone. Similarly, you children have become detached from the world of sorrow and are loving to the Father. This love of God becomes a canopy of protection, and what can anyone do to them those who have this canopy of God’s protection? So, maintain the intoxication that you are those who stay under God’s canopy of protection and that no waves of sorrow can even touch you.

Slogan:   
Those who glorify BapDada’s name and the name of the Brahmin clan with their elevated character are the lamps of the clan.
*** Om Shanti ***

Elevated versions of Mateshwari

1) God is one and all the rest ar e human souls

The whole world knows that God is One and that He is the Almighty Authority, Janijananhar. In fact, the whole world says: We are the children of God. God is One. No matter what religion people belong to, they all say that they believe in God. Some consider themselves to be messengers who have been sent by God. They bring the message and establish their own religion. For instance, Guru Nanak sang such praise of God saying that God is “Ek Omkar”, the Truth. “Ek Omkar” means that God is One. “Satnaam, the name Truth”, means that His name is the Truth, which means that God has a name and form, that He is imperishable. He is the Immortal Image and then He is the One who does everything, that is, although He is Akarta (One who doesn’t do anything), He becomes the One who does everything through the body of Brahma. All of this is praise of the one God. People understand all of this and still say that God is omnipresent. I, the soul, am the Supreme Soul. If all are God, then whose praise is it when they say: Ek omkar. This proves that God is One.

2) Success through direct knowledge from God

We are receiving imperishable knowledge directly from God, the Ocean of Knowledge. We call this knowledge Godly knowledge because it is through this knowledge that human beings attain happiness from the beginning, through the middle to the end, that is, they become liberated from the bondage of sorrow for birth after birth. It is because we don’t come into any bondage of karma that this knowledge is said to be imperishable knowledge. We receive this knowledge from only the one imperishable Supreme Father, the Supreme Soul, because He Himself is imperishable. All human souls have to come into the cycle of birth and death and this is why the knowledge we receive from them will not liberate us from karmic bondages. This is why their knowledge is said to be illusional or perishable knowledge. However, these deities are immortal because they have received this imperishable knowledge from imperishable God and this proves that God is One and that His knowledge is one. In this knowledge, you have to keep two main things in your intellects. We have to remain distant from the influence of vicious, iron-aged company and, secondly, we have to take precautions with our food and not eat or drink impure food. Only by observing these precautions can our lives be worthwhile.
July 16, 2018

‌BK murli today 17/07/2018 (Nepali) Brahma Kumaris Murli प्रातः मुरली Om Shanti.Shiv baba ke Mahavakya

BK Murli Today  17 July 2018 (Nepali)


17-07-2018
ओम् शान्ति
प्रातः मुरली
“बापदादा”
मधुबन
“ मीठे बच्चे – पावन बन्नको लागि आफ्नो स्वधर्ममा रहने गर , अशरीरी बनेर एक बाबालाई याद गर । ”
प्रश्न:–कुन विधिबाट नयाँ विद्यार्थीहरूमा ज्ञानको रङ्ग लाग्न सक्छ?
उत्तर:–उनीहरूलाई पहिले ७ दिनको भट्ठीमा बसाऊ। नियम छ– नयाँ कोही आयो भने उसलाई फाराम भराऊ। पहिले ७ दिनको भट्ठीमा रह्यो भने पूरा रङ्ग लाग्छ। तिमी भ्रमरीहरू ज्ञानको भूँ-भूँ गरेर आफू समान बनाउँछौ। तिमीलाई थाहा छ– अहिले देवता धर्मको कलमी लागिरहेको छ। जो यस घरानाका आत्माहरू हुन् तिनीहरू महा-रोगीबाट निरोगी बन्ने पुरुषार्थमा लाग्छन्।
गीत:–महफील में जल उठी शमा... Audio Player
ओम् शान्ति  बच्चाहरूलाई ओम् शान्तिको अर्थ त सम्झाइएको छ, ओम् अर्थात् अहम्। अहम् को हो? आत्मा अनि मेरो शरीरका कर्मेन्द्रियहरू। आत्माको स्वधर्म हो नै शान्ति। आत्मा कसको सन्तान हो? भन्दछन, परमपिता परमात्माको। उहाँ पनि शान्त हुनुहुन्छ। आत्माहरू शान्तिको दुनियाँमा रहन्छन्। फेरि पार्ट बजाउनको लागि आवाजको दुनियाँमा आउँछन्। अब बेहदका बाबा भन्नुहुन्छ– प्यारा बच्चाहरू, आफ्नो स्वधर्ममा रहने गर। अशरीरी भएर बस। बाबालाई याद गर। उहाँ बाबालाई शमा पनि भनिन्छ। अब यो हो महफील (समारोह) पतित मनुष्यहरूको। यतिखेर यो पतित दुनियाँ हो। मनुष्य मात्र पतित छन्। सम्झाइएको छ– सत्ययुगमा सृष्टि पावन थियो। गृहस्थ धर्म भनिन्थ्यो, जसलाई सुखधाम भनिन्छ। सृष्टि पावन थियो अहिले पतित छ। दु:खधाम छ। यो चक्र घुमिरहन्छ। अहिले यो हो कल्याणकारी संगमयुग, जबकि पतित मनुष्य-सृष्टिमा बाबा आउनु पर्छ– पतित मनुष्य सृष्टिलाई पावन बनाउन। पुरानो दुनियाँबाट नयाँ दुनियाँ बाबा रचयिताले नै बनाउनुहुन्छ, जसलाई परमपिता परमात्मा भनिन्छ। सबै भक्तहरूको भगवान् एक हुनुहुन्छ। त्यसैले बाबा भन्नुहुन्छ– मैले पनि पतित दुनियाँ पतित शरीरमा आउनु पर्छ। परमधामबाट एकै पटक आउँछु– भारतवर्षलाई पावन दैवी राज्य बनाउन। यस विश्वको इतिहास-भूगोललाई कसैले जान्दैनन् किनकि सबै नास्तिक छन्। एउटा पनि आस्तिक मनुष्य छैन। बाबालाई नजान्नाको कारण अनाथ बनेका छन्। आपसमा लडाइँ झगडा गरिरहन्छन्। घर-घरमा कति अशान्ति छ। सत्ययुग आदिमा एक सर्वशक्ति सम्पन्न दैवी राज्य थियो, सुखधाम थियो फेरि दु:खधाम कसरी बन्यो– यो कसैले जान्दैनन्।
ज्ञान हो ब्रह्माको दिन। भक्ति हो ब्रह्माको रात। संन्यासीहरू भन्छन्– ज्ञान, भक्ति र वैराग्य। ती त घरबार छोडेर जंगलमा जान्छन्। वैराग्य आउँछ। त्यो हो रजोगुणी संन्यास, यो हो सतोप्रधान संन्यास। यस पाप आत्माहरूको दुनियाँमा एउटा पनि पुण्य आत्मा छैन। यो खेल सारा भारत-खण्डमा हुन्छ। भारत-खण्ड सुनको पंछी समान थियो। यहाँ नै सुन र हीरा अथाह थियो। सुनका महल बनाउँथे अनि हीरा-जुहारत जडिएको हुन्थ्यो। अहिले भारतवर्ष कौडी समान बनेको छ। फेरि त्यसलाई हीरा जस्तो बाबाले नै बनाउनुहुन्छ। तिमीहरू जान्दछौ हामी मनुष्यबाट देवता बनिरहेका छौं। अहिले उहाँ बाबा पतितहरूको उत्सवमा आउनु भएको छ। मनुष्यहरू सम्झिन्छन्– पतित-पावनी गंगा हो, त्यसैले स्नान गर्न जान्छन्। फेरि पनि कोही पाप आत्माबाट पुण्य आत्मा बन्दैनन्। अझै हरेक वर्ष गएर गंगा स्नान गर्छन्। यस समयमा कोही पनि पावन छैनन्। जबसम्म पावन बनाउने बाबा आउनुहुन्न तबसम्म पावन बन्न सक्तैनन्। पावन बनाउनुहुन्छ गीताका भगवान्। उहाँ भगवान् त सबै आत्माहरूको बाबा एकै हुनुहुन्छ। यस्तो होइन सबै भक्त भगवान् हुन् वा भगवान सर्वव्यापी छन्। यो त भगवानको ग्लानि गर्छन्, त्यसैले यदा यदाहि.. यो यहाँको लागि नै गायन हो। जो बाबा आएर सृष्टिलाई हीरा जस्तो बनाउनुहुन्छ उहाँको कति निन्दा गर्छन्। ऋषि-मुनिले भन्दै आए– रचयिता र रचना बेअन्त छन् अथवा नेति-नेति छन्, हामी जान्दैनौ। तर आजकलका मनुष्य फेरि सर्वव्यापी भनिदिन्छन्। बाबा भन्नुहुन्छ– जब यस्ता बन्छन् तब म आएर पाप आत्माबाट पुण्य आत्मा देवता बनाउँछु। सबैका सद्गतिदाता हुनुहुन्छ नै एक। उहाँ नै आएर पतितबाट पावन बनाएर लायक बनाउनुहुन्छ। बच्चाहरूलाई वर्सा दिनुहुन्छ। लौकिक बुवाबाट मिल्छ अल्पकालको वर्सा। बेहदका बाबा भन्नुहुन्छ– म तिमीहरूलाई २१ जन्मको लागि वर्सा दिन्छु पवित्रता, शान्ति र सुखको, जो लौकिक बुवाले दिन सक्तैनन्। उहाँ बाबा पनि हुनुहुन्छ, शिक्षक पनि हुनुहुन्छ, ज्ञानका सागर पनि हुनुहुन्छ। बाबाको महिमा धेरै उच्च छ, मनुष्य सृष्टिका बीजरूप पनि हुनुहुन्छ। यो मनुष्य सृष्टि विविध धर्मको वृक्ष हो। आदि सनातन देवी-देवता धर्म हो सत्ययुगको। त्यसबाट फेरि अरू धर्महरू प्रकट हुन्छन्। अहिले तिमी ब्राह्मण धर्मका बनेका छौ। यसभन्दा पहिले शूद्र धर्मका थियौ। अहिले ब्राह्मणबाट देवता अनि फेरि क्षत्रिय बन्ने छौ। यो ८४ को चक्र लगाउनु पर्छ। सत्ययुगमा पनि सुरु-सुरुमा तिमीहरू आउँछौ। गायन पनि छ– आत्मा परमात्मा अलग रहे...। गीतमा पनि सुन्यौ– चारों तरफ लगाये फेरे फिर भी हरदम दूर रहे अर्थात् बाबा सँग मिल्न सकेनन्।
अहिले छ रावण राज्य, रामराज्य हो दैवी राज्य। मनुष्य सम्झन्छन्– स्वर्ग-नर्क यही छ। तर यस्तो हुन सक्तैन। मनुष्य मरे पछि स्वर्गवासी भयो भन्छन्, तब अवश्य नर्कमा थियो। त्यसो भएकोले अवश्य पुनर्जन्म नरकमा नै लिनु पर्छ। मनुष्यहरूको त अनेक मत छन्। एक अर्को सँग मिल्दैन। अनेक प्रकारका द्वैत मत छन्। आधा कल्प भारत-खण्डमा हुन्छ दैवी मत। अहिले छ आसुरी मत। जुन भगवानलाई याद गरिन्छ, उहाँ पारलौकिक बाबालाई त जान्नु पर्छ। अहिले भारत-खण्ड कौडी समान छ। त्यसलाई हीरा जस्तो बनाउनु छ। गान्धी र नेहरू पनि चाहन्थे रामराज्य होस्। सम्झिन्छन्– कुनै समय थियो, अहिले छैन, त्यसैले रामराज्यको कोसिस गर्छन्। तर यो कुनै मनुष्यको हातमा छैन। तिमी हौ ब्राह्मण, प्रजापिता ब्रह्माका सन्तान। निराकार आत्माहरू हुन् परमपिता परमात्माका सन्तान। वर्सा मिल्छ ब्रह्माकुमार-कुमारीहरूलाई। ब्रह्मालाई पनि वर्सा शिवबाबाबाट मिल्छ। यी पनि भाइ नै हुन्। बच्चाहरू सबै हुन् भाइ-भाइ, तब त अवश्य एक बाबा हुनुहुन्छ सबै आत्माहरूको। अहिले तिमी ब्रह्माका मुख वंशावली ब्राह्मण आपसमा भाइ-बहिनी हौ। तिमीहरूलाई वर्सा मिल्छ हजुरबुवाबाट। हजुरबुवाको वर्सामा सबै आत्माहरूको हक हुन्छ। चाहे स्त्री चाहे पुरुषका चोलामा हुन्। लौकिक हजुरबुवाको वर्सा केवल बच्चाहरूलाई मिल्छ। यहाँ त बेहदका बाबा हुनुहुन्छ नि। सत्ययुग-त्रेतामा बेहदका बाबाबाट २१ पिंढीसम्म धेरै सुख मिलेको थियो। तिमीले ८४ को चक्रलाई अहिले बुझिसकेका छौ। बाबा भन्नुहुन्छ– म पण्डा बनेर आएको छु तिमीहरू सबैलाई लैजान। तिमीहरू नै पहिला-पहिला आएका थियौ। अहिले अन्त्यमा पनि तिमीहरू नै छौ। फेरि पहिला-पहिला तिमीहरू नै मनुष्यबाट देवता बन्नेवाला हौ। देवी-देवता धर्मवाला नै ८४ जन्म लिन्छन्। फेरि नम्बरवार सबैका कम जन्म हुँदै जान्छन्। अन्य धर्मवालाहरूको अवश्य कम जन्म हुन्छ। अहिले त्यो आदि सनातन देवी-देवता धर्म छैन। पुनः स्थापना भइरहेको छ। तिमीहरू जान्दछौ– इब्राहम फेरि कहिले आउँछन्? क्राइष्ट कति समय पछि आउँछन्? यो विश्वको इतिहास-भूगोल मनुष्यले नै जान्नेछन्। बाबा सम्झाउनुहुन्छ जब सबै पाप आत्मा बन्छन् तब म आएर पुण्य आत्मा बनाउँछु। जो कल्प पहिला बनेका थिए उनको कलमी लगाइरहेको छु। सत्ययुगमा थियो नै एक धर्म। अहिले त कलियुगमा अनेक धर्म छन्। पतित आत्माहरूको महफील हो। बाबा आउनुहुन्छ सबैलाई पावन बनाउन। सद्गति दिनेवाला उहाँ एक हुनुहुन्छ। माया रावण दुर्गति गर्छ, त्यसैले देवताहरूको अगाडि गएर गाउँछन्– मै निर्गुण हारे में कोइ गुण नाहीं। बाबा आएर पतितबाट पावन बनाई दैवी गुणवाला बनाउनुहुन्छ। अहिले तिमी दैवी गुण धारण गर्दै जान्छौ। फेरि सृष्टि दैवी राज्य बन्छ। अहिले यो पुरानो दुनियाँ बदलिइरहेको छ।
तिमी हौ बेहदका संन्यासी। उनीहरूको हो हदको वैराग्य। यो हो बेहदको वैराग्य। तिमीहरू सारा पुरानो सृष्टिलाई भुलेर आफ्ना पितालाई याद गरेर वर्सा लिन्छौ। बाबा भन्नुहुन्छ– मलाई याद गर्यौ भने त्यस याद अथवा योग अग्निबाट विकर्म विनाश हुन्छ। फेरि तिमी विकर्माजित बन्छौ। बाबाले सम्झाउनु भएको छ– जब कोही ४-५ जना सँग-सँगै आए भने फाराम बेग्ला-बेग्लै भराऊ। तब थाहा हुन्छ– त्यो कुन धर्मको हो? अनेक धर्म, अनेक मतहरू छन् नि। देवी-देवता धर्मकाहरूलाई नै तीर लाग्छ। कराँचीमा सधैं बेग्ला-बेग्लै सम्झाउँथे। फाराम भराउने नियम पनि आवश्यक छ। ७ दिन भट्ठीमा पर्नु पर्छ किनकि महारोगी बनेका छन्। (कुमालकोटीको उदाहरण) तिमी बच्चाहरू कुमालकोटी (भ्रमरी) हौ। भूँ-भूँ गरेर आफू समान बनाउनु पर्छ। देवता धर्मवालाको नै कलमी लाग्ने छ। बच्चाहरूले युक्तिहरू पनि सिक्नु पर्छ। भन सात दिन जब सम्झन्छौ तब मिलन हुन सक्ने छ अनि मात्र तिमीमाथि रङ्ग लाग्ने छ। तिमीहरू सबै ब्रह्माकुमार-कुमारीहरू हौ। मनुष्य यति पनि सोध्दैनन्, यति ब्रह्माकुमार-कुमारीहरू के हुन्? को हुन्? अरे, प्रजापिता ब्रह्माका सन्तानलाई त अवश्य ब्रह्माकुमार-कुमारीहरू नै भनिन्छ। दोष दृष्टि हुन सक्तैन। यो हो राजयोग ईश्वर पिताको विश्व विद्यालय। भगवानुवाच– म तिमीलाई राजाहरूको पनि राजा बनाउँछु। अच्छा!
मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चाहरूप्रति माता-पिता बापदादाको याद-प्यार एवं गुडमर्निङ्ग। रूहानी बाबाको रूहानी बच्चाहरूलाई नमस्ते। रूहानी बच्चाहरूको रूहानी बाबालाई गुडमर्निङ्ग, नमस्ते।
धारणाको लागि मुख्य सारः–
१) विकर्माजित बन्नको लागि सारा पुरानो दुनियाँबाट बेहदको वैराग्य धारण गर्नु छ अनि यसलाई भुलेर एक बाबाको यादमा रहनु छ।
२) भ्रमरी समान ज्ञान रङ्ग लगाउने सेवा गर्नु छ, युक्तिले महारोगीहरूलाई निरोगी, नास्तिकलाई आस्तिक बनाउनु छ।
मातेश्वरीजीको महावाक्य :–
 परमात्मा एक हुनुहुन्छ , अन्य सबै मनुष्यआत्माहरू हुन्”
अहिले यो सारा दुनियाँले जान्दछ– परमात्मा एक हुनुहुन्छ, उहाँ सर्वशक्तिमान हुनुहुन्छ, जानिजाननहार हुनुहुन्छ। यसै त सारा दुनियाँले स्वयं पनि भन्दछ हामी परमात्माका सन्तान हौं। परमात्मा एक हुनुहुन्छ, चाहे जुनसुकै धर्मवाला हुन् उनीहरू पनि परमात्मालाई नै मान्छन्, उनीहरू पनि आफूलाई परमात्माद्वारा पठाइएको सन्देशवाहक सम्झन्छन् यस्तै सन्देश लिएर आ-आफ्नो धर्मको स्थापना गर्छ। जसरी गुरु नानकले पनि परमात्माको यति धेरै महिमा गरे– एकोंकार सत् नाम। एकोंकारको अर्थ हो परमात्मा एक हुनुहुन्छ। सत् नाम अर्थात् उहाँको नाम सत्य हो भने परमात्मा नाम-रूप वाला हुनुहुन्छ, अविनाशी हुनुहुन्छ, अकालमूर्त पनि हुनुहुन्छ अनि कर्ता पुरुष पनि हुनुहुन्छ अर्थात् उहाँ स्वयं अकर्ता भएर पनि कसरी ब्रह्मा तनद्वारा कर्ता पुरुष पनि बन्नुहुन्छ। अब यो सारा महिमा एक परमात्माको नै हो, मनुष्यले यतिका कुरा बुझेर पनि फेरि पनि भन्छन् ईश्वर सर्वत्र हुनुहुन्छ। अहम् आत्मा सो परमात्मा हो, यदि सबै परमात्मा भए फेरि एकोंकार, यो महिमा कुन परमात्माको गर्छन्? यसको प्रमाण हो परमात्मा एक हुनुहुन्छ।
 प्रत्यक्ष ईश्वरीय ज्ञानबाट सफलता”
यो हामीलाई जुन अविनाशी ज्ञान मिलिरहेको छ, त्यो प्रत्यक्ष ज्ञानसागर परमात्माद्वारा मिलिरहेको छ। यस ज्ञानलाई हामी ईश्वरीय ज्ञान भन्दछौं, किनकि यस ज्ञानबाट मनुष्य आदि-मध्य-अन्त्य सुख पाउँछन् अर्थात् जन्म-जन्मान्तर दु:खको बन्धनबाट छुट्छन्। कर्म बन्धनमा आउँदैनन्, त्यसैले यस ज्ञानलाई अविनाशी ज्ञान भनिन्छ। अहिले यो ज्ञान केवल एउटै अविनाशी परमपिता परमात्माद्वारा हामीलाई प्राप्त हुन्छ किनकि उहाँ स्वयं अविनाशी हुनुहुन्छ। बाँकी सबै मनुष्य आत्माहरू जन्म-मरणको चक्रमा आउँछन्, त्यसैले उनीहरूद्वारा प्राप्त भएको ज्ञान, हामीलाई कर्मबन्धनबाट छुट्कारा दिनेवाला होइन। त्यसैले उनीहरूको ज्ञानलाई मिथ्या ज्ञान अथवा विनाशी ज्ञान भनिन्छ। तर यी देवताहरू सधैं अमर छन् किनकि अविनाशी परमात्माद्वारा यो अविनाशी ज्ञान प्राप्त गरे, यसबाट सिद्ध हुन्छ परमात्मा पनि एक हुनुहुन्छ भने उहाँको ज्ञान पनि एक छ, यो ज्ञानमा दुई मुख्य कुरा बुद्धिमा राख्नु छ, एक यसमा विकारी कलियुगी सङ्गदोषबाट टाढा रहनु छ र अर्को कुरा म्लेच्छ (तामसिक) खान-पान आदिको परहेज राख्नु छ। यो परहेज राख्नाले नै जीवन सफल हुन्छ। अच्छा। ओम् शान्ति।
वरदान:–परमात्म प्यारको छत्रछायाँमा सधैं सुरक्षित अनुभव गर्ने दु:ख को लहरबाट मुक्त भव
जसरी कमल पुष्प हिलोमा भएर पनि निर्लिप्त (न्यारा) रहन्छ, अनि जति न्यारा त्यति नै प्यारा हुन्छ। यसैगरी तिमी बच्चाहरू पनि दु:खको संसार देखि न्यारा र बाबाको प्यारा बनेका छौ, यो परमात्म प्यार नै छत्रछायाँ बन्छ। जसमाथि परमात्म छत्रछायाँ हुन्छ, उसलाई कसले के गर्न सक्छ! त्यसैले हामी परमात्म छत्रछायाँमा रहने आत्मा हौं, दु:खको लहरले हामीलाई स्पर्श मात्र पनि गर्न सक्दैन, यस्तो नशामा रहने गर।
स्लोगन:–जसले आफ्नो श्रेष्ठ चरित्रद्वारा बापदादा र ब्राह्मण कुलको नाम प्रसिद्ध गर्छ, ऊ नै कुलदीपक हो।
                         Om Shanti