BK Murli today in Hindi

Prajapita Brahma Kumaris Ishwariya Vishwa Vidyalaya Daily Gyan Murli Om Shanti

Friday, 15 February 2019

February 15, 2019

BK murli today 16/02/2019 (Hindi) Brahma Kumaris Murli प्रातः मुरली Om Shanti.Shiv baba ke Mahavakya

 BK Murli Today 16 February 2019 Hindi


16/02/2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - ऊंच पद पाने के लिए बाप तुम्हें जो पढ़ाते हैं उसे ज्यों का त्यों धारण करो, सदा श्रीमत पर चलते रहो''
प्रश्नः-
कभी भी अफसोस न हो, उसके लिए किस बात पर अच्छी तरह विचार करो?
उत्तर:-
हर एक आत्मा जो पार्ट बजा रही है, वह ड्रामा में एक्यूरेट नूँधा हुआ है। यह अनादि और अविनाशी ड्रामा है। इस बात पर विचार करो तो कभी भी अफसोस नहीं हो सकता। अफसोस उन्हें होता जो ड्रामा के आदि मध्य अन्त को रियलाइज नहीं करते हैं। तुम बच्चों को इस ड्रामा को ज्यों का त्यों साक्षी होकर देखना है, इसमें रोने रूसने की कोई बात नहीं।
 BK Murli Today 16 February 2019 Hindi 



ओम् शान्ति।
रूहानी बाप बैठ रूहानी बच्चों को समझाते हैं कि आत्मा कितनी छोटी है। बहुत छोटी है और छोटी सी आत्मा से शरीर कितना बड़ा देखने में आता है। छोटी आत्मा अलग हो जाती है तो फिर कुछ भी नहीं देख सकती। आत्मा के ऊपर विचार किया जाता है। इतनी छोटी बिन्दी क्या-क्या काम करती है। मैग्नीफाय ग्लास होते हैं, उनसे छोटे-छोटे हीरों को देखा जाता है। कोई दाग आदि तो नहीं है। तो आत्मा भी कितनी छोटी है। कैसे मैग्नीफाय ग्लास है - जिससे देखते हो। रहती कहाँ है? क्या कनेक्शन है? इन आंखों से कितना बड़ा धरती आसमान देखने में आता है! बिन्दी निकल जाने से कुछ नहीं रहता। जैसे बिन्दी बाप वैसे बिन्दी आत्मा। इतनी छोटी आत्मा प्युअर इमप्युअर बनती है। यह बहुत विचार करने की बातें हैं। दूसरा कोई नहीं जानते - आत्मा क्या है, परमात्मा क्या है। इतनी छोटी आत्मा शरीर में रह क्या-क्या बनाती है। क्या-क्या देखती है। उस आत्मा में सारा पार्ट भरा हुआ है - 84 का। कैसे वह काम करती है, वन्डर है। इतनी छोटी सी बिन्दी में 84 जन्मों का पार्ट नूँधा हुआ है। एक शरीर छोड़ दूसरा लेती है। समझो नेहरू मरा, क्राइस्ट मरा। आत्मा निकल गई तो शरीर मर गया। कितना बड़ा शरीर है और कितनी छोटी आत्मा है। यह भी बाबा ने बहुत बार समझाया है कि मनुष्यों को कैसे पता पड़े कि यह सृष्टि का चक्र हर 5 हजार वर्ष बाद फिरता है। फलाना मरा यह कोई नई बात नहीं। उनकी आत्मा ने यह शरीर छोड़ दूसरा लिया। 5 हजार वर्ष पहले भी इस नाम रूप को इसी समय छोड़ा था। आत्मा जानती है हम एक शरीर छोड़ दूसरे में प्रवेश करती हूँ।

अभी तुम शिवजयन्ती मनाते हो। दिखाते हो 5 हजार वर्ष पहले भी शिवजयन्ती मनाई थी। हर 5 हजार वर्ष बाद शिवजयन्ती जो हीरे तुल्य है, मनाते ही आते हैं। यह सही बातें हैं। विचार सागर मंथन करना होता है जो औरों को समझा सकें। यह त्योहार होते हैं, तुम कहेंगे नई बात नहीं, हिस्ट्री रिपीट होती है जो फिर 5 हजार वर्ष बाद जो भी पार्टधारी हैं वह अपना शरीर लेते हैं। एक नाम रूप देश काल छोड़ दूसरा लेते हैं। इस पर विचार सागर मंथन कर ऐसा लिखें जो मनुष्य वन्डर खायें। बच्चों से हम पूछते हैं ना - आगे कब मिले हो? इतनी छोटी आत्मा से ही पूछना होता है ना। तुम इस नाम रूप में आगे कब मिले थे? आत्मा ने सुना। तो बहुत कहते हैं हाँ बाबा, आपसे कल्प पहले मिले थे। सारा ड्रामा का पार्ट बुद्धि में है। वह होते हैं हद के ड्रामा के एक्टर्स। यह है बेहद का ड्रामा। यह ड्रामा बड़ा एक्यूरेट है, इसमें जरा भी फ़र्क नहीं पड़ सकता। वह बाइसकोप होते हैं हद के, मशीन पर चलते हैं। दो चार रोल भी हो सकते हैं, जो फिरते हैं। यह तो अनादि अविनाशी एक ही बेहद का ड्रामा है। इसमें कितनी छोटी आत्मा एक पार्ट बजाए फिर दूसरा बजाती है। 84 जन्मों का कितना बड़ा फिल्म रोल होगा। यह कुदरत है। कोई की बुद्धि में बैठेगा! है तो रिकार्ड मिसल, बड़ा वन्डरफुल है। 84 लाख तो हो न सके। 84 का ही चक्र है, इनकी पहचान कैसे दी जाए। अखबार वालों को भी समझाओ तो डालेंगे। मैंगजीन में भी घड़ी-घड़ी डाल सकते हैं। हम इस संगम के समय की ही बातें करते हैं। सतयुग में तो यह बातें होंगी नहीं। न कलियुग में होंगी। जानवर आदि जो भी कुछ हैं, सबके लिए कहेंगे फिर 5 हजार वर्ष के बाद देखेंगे। फर्क नहीं पड़ सकता। ड्रामा में सारी नूँध है। सतयुग में जानवर भी बहुत खूबसूरत होंगे। यह सारी वर्ल्ड की हिस्ट्री-जॉग्राफी रिपीट होगी। जैसे ड्रामा की शूटिंग होती है। मक्खी उड़ी वह भी निकल गई तो फिर रिपीट होगी। अब हम इन छोटी-छोटी बातों का ख्याल तो नहीं करेंगे। पहले तो बाप खुद कहते हैं हम कल्प-कल्प संगमयुगे इस भाग्यशाली रथ पर आता हूँ। आत्मा ने कहा कैसे इसमें आते हैं, इतनी छोटी बिन्दी है। उनको फिर ज्ञान का सागर कहते हैं। यह बातें तुम बच्चों में भी जो समझू हैं, वह समझ सकते हैं। हर 5हजार वर्ष के बाद मैं आता हूँ। कितनी यह वैल्युबुल पढ़ाई है। बाप के पास ही एक्यूरेट नॉलेज है जो बच्चों को देते हैं। तुम्हारे से कोई पूछे तुम झट कहेंगे सतयुग की आयु 1250 वर्ष की है। एक-एक जन्म की आयु 150 वर्ष होती है। कितना पार्ट बजता है। बुद्धि में सारा चक्र फिरता है। हम 84 जन्म लेते हैं। सारी सृष्टि ऐसे चक्र में फिरती रहती है। यह अनादि अविनाशी बना बनाया ड्रामा है। इसमें नई एडीशन हो नहीं सकती। गायन भी है चिंता ताकी कीजिए जो अनहोनी होए। जो कुछ होता है ड्रामा में नूँध है। साक्षी होकर देखना पड़ता है। उस नाटक में कोई ऐसा पार्ट होता है तो जो कमजोर दिल वाले होते हैं वो रोने लग पड़ते हैं। है तो नाटक ना। यह रीयल है, इसमें हर आत्मा अपना पार्ट बजाती है। ड्रामा कभी बन्द नहीं होता है। इसमें रोने रूसने की कोई बात नहीं। कोई भी नई बात थोड़ेही है। अफसोस उनको होता है जो ड्रामा के आदि मध्य अन्त को रियलाइज नहीं करते। यह भी तुम जानते हो। इस समय जो हम इस ज्ञान से पद पाते हैं, चक्र लगाकर फिर वही बनेंगे। यह बड़ी आश्चर्यवत विचार सागर मंथन करने की बातें हैं। कोई भी मनुष्य इन बातों को नहीं जानते। ऋषि मुनि भी कहते थे - हम रचता और रचना को नहीं जानते हैं। उनको क्या पता कि रचता इतनी छोटी बिन्दी है। वही नई सृष्टि का रचता है। तुम बच्चों को पढ़ाते हैं, ज्ञान का सागर है। यह बातें तुम बच्चे ही समझाते हो। तुम थोड़ेही कहेंगे हम नहीं जानते हैं। तुमको बाप इस समय सब समझाते हैं।

तुमको कोई भी बात में अफसोस करने की जरूरत नहीं। सदैव हर्षित रहना है। उस ड्रामा की फिल्म चलते चलते घिस जायेगी, पुरानी हो जायेगी फिर बदली करेंगे। पुरानी को खलास कर देते हैं। यह तो बेहद का अविनाशी ड्रामा है। ऐसी-ऐसी बातों पर विचार कर पक्का कर लेना चाहिए। यह ड्रामा है। हम बाप की श्रीमत पर चल पतित से पावन बन रहे हैं और कोई बात हो नहीं सकती, जिससे हम पतित से पावन बन जायें अथवा तमो-प्रधान से सतोप्रधान बनें। पार्ट बजाते-बजाते हम सतोप्रधान से तमोप्रधान बने हैं फिर सतोप्रधान बनना है। न आत्मा विनाश को पा सकती, न पार्ट विनाश को पा सकता। ऐसी-ऐसी बातों पर कोई का विचार नहीं चलता। मनुष्य तो सुनकर वन्डर खायेंगे। वह तो सिर्फ भक्ति मार्ग के शास्त्र ही पढ़ते हैं। रामायण, भागवत, गीता आदि वही हैं। इसमें तो विचार सागर मंथन करना होता है। बेहद का बाप जो समझाते हैं उसको ज्यों का त्यों हम धारण कर लें तो अच्छा ही पद पा लें। सब एक जैसी धारणा नहीं कर सकते हैं। कोई तो बहुत महीनता से समझाते हैं। आजकल जेल में भी भाषण करने जाते हैं। वेश्याओं के पास भी जाते हैं, गूँगे बहरों के पास भी बच्चे जाते होंगे क्योंकि उन्हों का भी हक है। इशारे से समझ सकते हैं। आत्मा समझने वाली तो अन्दर है ना। चित्र सामने रख दो, पढ़ तो सकेंगे ना। बुद्धि तो आत्मा में है ना। भल अन्धे लूले लंगड़े हैं परन्तु कोई न कोई प्रकार से समझ सकते हैं। अन्धों के कान तो हैं। तुम्हारा सीढ़ी का चित्र तो बहुत अच्छा है। यह नॉलेज कोई को भी समझाकर स्वर्ग में जाने लायक बना सकते हो। आत्मा बाप से वर्सा ले सकती है। स्वर्ग में जा सकती है। करके आरगन्स डिफेक्टेड हैं। वहाँ तो लूले लंगड़े होते नहीं। वहाँ आत्मा और शरीर दोनों कंचन मिल जाते हैं। प्रकृति भी कंचन है, नई चीज़ जरूर सतोप्रधान होती है। यह भी ड्रामा बना हुआ है। एक सेकेण्ड न मिले दूसरे से। कुछ न कुछ फर्क पड़ता है। ऐसे ड्रामा को ज्यों का त्यों साक्षी होकर देखना है। यह नॉलेज तुमको अब मिलती है फिर कभी नहीं मिलनी है। आगे यह नॉलेज थोड़ेही थी, यह अनादि अविनाशी बना बनाया ड्रामा कहा जाता है। इसको अच्छी रीति समझ और धारण कर किसी को समझाना है।

तुम ब्राह्मण ही इस ज्ञान को जानते हो। यह तो चोबचीनी (ताकत की दवा) तुमको मिलती है। अच्छे ते अच्छी चीज़ की महिमा की जाती है। नई दुनिया कैसे स्थापन होती है फिर से यह राज्य कैसे होगा तुम्हारे में भी नम्बरवार जानते हैं। जो जानते हैं वह दूसरों को समझा भी सकते हैं। बहुत खुशी रहती है। किन्हों को तो पाई की भी खुशी नहीं है। सबका अपना-अपना पार्ट है। जिनको बुद्धि में बैठता होगा, विचार सागर मंथन करते होंगे तो दूसरों को भी समझायेंगे। तुम्हारी यह है पढ़ाई जिससे तुम यह बनते हो। तुम कोई को भी समझाओ कि तुम आत्मा हो। आत्मा ही परमात्मा को याद करती है। आत्मायें सब ब्रदर्स हैं। कहावत है गाड इज वन। बाकी सब मनुष्यों में आत्मा है। सब आत्माओं का पारलौकिक बाप एक है। जो पक्के निश्चयबुद्धि होंगे उनको कोई फिरा नहीं सकते। कच्चे को जल्दी फिरा देंगे। सर्वव्यापी के ज्ञान पर कितनी डिबेट करते हैं। वह भी अपने ज्ञान पर पक्के हैं, हो सकता है हमारे इस ज्ञान का न हो। उनको देवता धर्म का कैसे कह सकते। आदि सनातन देवी-देवता धर्म तो प्राय:लोप है। तुम बच्चों को मालूम है, हमारा ही आदि सनातन धर्म पवित्र प्रवृत्ति वाला था। अब तो अपवित्र हो गया है। जो पहले पूज्य थे वही पुजारी बन पड़े हैं। बहुत प्वाइंट्स कण्ठ होंगी तो समझाते रहेंगे। बाप तुमको समझाते हैं तुम फिर औरों को समझाओ कि यह सृष्टि चक्र कैसे फिरता है। सिवाए तुम्हारे और कोई नहीं जानते। तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं।

बाबा को भी घड़ी-घड़ी प्वाइंट्स रिपीट करनी पड़ती हैं क्योंकि नये-नये आते हैं। शुरू में कैसे स्थापना हुई, तुम्हारे से पूछेंगे फिर तुमको भी रिपीट करना पड़ेगा। तुम बहुत बिजी रहेंगे। चित्रों पर भी तुम समझा सकते हो। परन्तु ज्ञान की धारणा सबको एकरस तो नहीं हो सकती है। इसमें ज्ञान चाहिए, याद चाहिए, धारणा बड़ी अच्छी चाहिए। सतोप्रधान बनने के लिए बाप को याद जरूर करना है। कई बच्चे तो अपने धन्धे में फँसे रहते हैं। कुछ भी पुरूषार्थ ही नहीं करते। यह भी ड्रामा में नूँध है। कल्प पहले जिन्होंने जितना पुरूषार्थ किया है उतना ही करेंगे। पिछाड़ी में तुमको एकदम भाई-भाई होकर रहना है। नंगे आये हैं, नंगे जाना है। ऐसा न हो पिछाड़ी में कोई याद आ जाये। अभी तो कोई वापिस जा न सके। जब तक विनाश न हो, स्वर्ग में कैसे जा सकेंगे। जरूर या तो सूक्ष्मवतन में जायेंगे या यहाँ ही जन्म लेंगे। बाकी जो कमी रही होगी उसका पुरूषार्थ करेंगे। वह भी बड़े हों तब समझ सकें। यह भी ड्रामा में सारी नूँध है। तुम्हारी एकरस अवस्था तो पिछाड़ी में ही होगी। ऐसे नहीं लिखने से सब याद हो सकता है। फिर लाइब्रेरीज़ आदि में इतनी किताबें क्यों होती हैं। डॉक्टर, वकील लोग बहुत किताबें रखते हैं। स्टडी करते रहते हैं, वह मनुष्य, मनुष्य के वकील बनते हैं। तुम आत्मायें, आत्माओं के वकील बनती हो। आत्मायें, आत्माओं को पढ़ाती हैं। वह है जिस्मानी पढ़ाई। यह है रूहानी पढ़ाई। इस रूहानी पढ़ाई से फिर 21 जन्म कभी भूलचूक नहीं होगी। माया के राज्य में बहुत भूलचूक होती रहती है, जिस कारण से सहन करना पड़ता है। जो पूरा नहीं पढ़ेंगे, कर्मातीत अवस्था को नहीं पायेंगे तो सहन करना ही पड़ेगा। फिर पद भी कम हो जायेगा। विचार सागर मंथन कर औरों को सुनाते रहेंगे तब चिन्तन चलेगा। बच्चे जानते हैं कल्प पहले भी ऐसे बाप आया था, जिसकी शिवजयन्ती मनाई जाती है। लड़ाई आदि की तो कोई बात नहीं। वह सब हैं शास्त्रों की बातें। यह पढ़ाई है। आमदनी में खुशी होती है। जिनको लाख होते हैं, उनको जास्ती खुशी होती है। कोई लखपति भी होते हैं, कोई कखपति भी होते हैं अर्थात् थोड़े पैसे वाले भी होते हैं। तो जिसके पास जितने ज्ञान रत्न होंगे उतनी खुशी भी होगी। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का यादप्यार और गुडमार्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) विचार सागर मंथन कर स्वयं को ज्ञान रत्नों से भरपूर करना है। ड्रामा के राज़ को अच्छी रीति समझकर दूसरों को समझाना है। किसी भी बात में अफसोस न कर सदा हर्षित रहना है।
2) अपनी अवस्था बहुतकाल से एकरस बनानी है ताकि पिछाड़ी में एक बाप के सिवाए दूसरा कोई भी याद न आये। अभ्यास करना है हम भाई भाई हैं, अभी वापस जाते हैं।
वरदान:-
सब कुछ बाप हवाले कर कमल पुष्प समान न्यारे प्यारे रहने वाले डबल लाइट भव
बाप का बनना अर्थात् सब बोझ बाप को दे देना। डबल लाइट का अर्थ ही है सब कुछ बाप हवाले करना। यह तन भी मेरा नहीं। तो जब तन ही नहीं तो बाकी क्या। आप सबका वायदा ही है तन भी तेरा, मन भी तेरा, धन भी तेरा - जब सब कुछ तेरा कहा तो बोझ किस बात का इसलिए कमल पुष्प का दृष्टान्त स्मृति में रख सदा न्यारे और प्यारे रहो तो डबल लाइट बन जायेंगे।
स्लोगन:-
रूहानियत से रोब को समाप्त कर, स्वयं को शरीर की स्मृति से गलाने वाले ही सच्चे पाण्डव हैं।


February 15, 2019

BK murli today 16/02/2019 (English) Brahma Kumaris Murli प्रातः मुरली Om Shanti.Shiv baba ke Mahavakya

 BK Murli Today 16 February 2019 English


16/02/2019 Morning Murli Om Shanti BapDada Madhuban


Sweet children, in order to claim a high status, imbibe the things that the Father teaches you exactly as He teaches you. Constantly continue to follow shrimat.
Question:
What should you think about very well so that you never have any regrets about anything?
Answer:
Whatever part each soul is playing is accurately fixed in the drama. This drama is eternal and imperishable. Think about this and you will never regret anything. Only those who don’t realise the beginning, middle and end of the drama have regrets. You children have to observe the drama as detached observers - exactly as it is. There is no question of crying or sulking in this.
 BK Murli Today 16 February 2019 English


Om Shanti
The spiritual Father sits here and explains to you spiritual children that souls are so tiny. The soul is very tiny whereas the body that is visible to the tiny soul is so large. When the tiny soul separates from it, he cannot see anything. You should think about the soul and what work such a tiny point does. Very tiny diamonds can be seen with a magnifying glass to see whether they have any flaws etc. Souls too are very tiny. See how they use a magnifying glass to examine diamonds. Look where the soul resides. Look at his connection. He sees such a huge earth and sky with these eyes. When the point departs, nothing remains. Just as the Father is a point, so, a soul too is a point. Such a tiny soul becomes pure and impure. These things have to be thought about very well. No one else knows what a soul is or what the Supreme Soul is. Look at what such a tiny soul does and what he sees while in a body. This soul has a whole part of 84 births recorded in him. It is a wonder how the soul works. Such a tiny point has a part recorded in him for 84 births. He sheds a body and takes another. When Nehru died and when Christ died, the bodies died and the souls left the bodies. The body is so large and the soul is so tiny. Baba has asked many times: How can people come to know that this world cycle turns every 5000 years? When someone dies, it is not a new thing. The soul of that person left that body and took another one. That soul had also left that name and form at this time 5000 years ago. The soul now knows that he sheds a body and takes another. You are now celebrating Shiva Jayanti. You show that you also celebrated Shiva Jayanti 5000 years ago. Every 5000 years, you have been celebrating Shiva Jayanti which is like a diamond. These things are true. You have to churn the ocean of knowledge so that you can then explain to others. You would say that these festivals are not new. History repeats so that every 5000 years all the actors take their own bodies. They shed their names, forms, places and times and take others. Churn this and write about it in such a way that people are amazed. I ask children: Have we met before? It is the tiny soul that has to be asked this. Did you meet Me before through that name and form? It is the soul that hears. So, many reply: Yes Baba, we met You before in the previous cycle. You each have a whole part in the drama in your intellect. Those actors are in limited dramas whereas this is the unlimited drama. This drama is very accurate; there cannot be the slightest difference in it. Those films that are played by a machine are limited. There can be two to four reels which continue to spin. This is the one and only eternal and imperishable unlimited drama. Such a tiny soul plays a part and then plays another part within it. A film reel of 84 births would be so long. This is nature. This sits in the intellects of some. It is like a record; it is very wonderful. It cannot be 8.4 million births; it is a cycle of 84 births. How can you give its introduction? If you explain to journalists, they would print it in the newspapers. You can also print this in the magazines every now and then. We are talking about the things of this confluence age. These things will not exist in the golden age or the iron age. It would be said of animals etc. and everything else that you will see all of that again after 5000 years; there cannot be any difference. Everything in the drama is fixed. In the golden age, animals will be very beautiful. The shooting of the history and geography of the whole world is taking place, just as shooting of a drama takes place. If a fly passes by and goes away, it will repeat in the same way. We will not worry about those trivial things now. First of all, the Father Himself says: I enter this lucky chariot every cycle at the confluence age. The soul said how He enters it. The soul is such a tiny point. He is then also called the Ocean of Knowledge. Only those of you children who are sensible are able to understand these things. I come every 5000 years. This is such a valuable study. Only the Father has accurate knowledge and He gives it to you children. If someone were to ask you, you would instantly be able to tell him that the duration of the golden age is 1250 years. The duration of each birth there is 150 years. Such a long part is played. You have the whole cycle in your intellects. We take 84 births. The whole world continues to turn in a cycle in this way. This drama is eternal, imperishable and predestined; there cannot be any new addition to it. It is remembered: Since everything is fixed, why worry about anything? Whatever happens is fixed in the drama. You have to observe it as a detached observer. In limited plays, when there are such parts played, those who are soft-hearted begin to cry. That is just a play, after all, whereas this is real. Here, each soul plays his own part. The drama never stops. There is no question of crying or sulking in this. This is nothing new. Only those who don’t realize the beginning, middle and end of the drama have regrets. Only you know this. Whatever status we attain through this knowledge at this time, we will become the same again after going around the cycle. These are very amazing things which you have to churn. No human beings know these things. Even the rishis and munis used to say: We do not know the Creator or creation. How would they know that the Creator is such a tiny point? He alone is the Creator of the new world. He is teaching you children. He is the Ocean of Knowledge. Only you children explain these things. You would not say that you do not know. The Father explains to you at this time. You don’t need to regret anything. You have to remain constantly cheerful. The film of those dramas will wear out through wear and tear; it will become old and you will then replace it and destroy the old one. This drama is unlimited and imperishable. You should think about these things and make them firm. This is the drama. We are following the Father’s shrimat and becoming pure from impure. There cannot be another way through which we impure ones can become pure or through which we can become satopradhan from tamopradhan. While playing our parts, we have become tamopradhan from satopradhan and we now have to become satopradhan. Neither is a soul destroyed nor is his part destroyed. No one thinks about such things. When people hear these things, they will be amazed. They simply study the scriptures of the path of devotion. The Ramayana, the Bhagawad, the Gita etc. are all the same. Here, you have to churn the ocean of knowledge. We have to imbibe everything that the unlimited Father explains, exactly as He explains it. Then we can claim a good status. Not everyone can imbibe to the same extent. Some people explain in great depth and subtlety. Nowadays, you go to give lectures in prisons. You also go to the prostitutes. You children must also go to those who are deaf and dumb, because they too have a right to this. They can understand through signals. The soul that understands is inside. Place a picture in front of them and they would at least be able to read it. The intellect is in the soul. Even if someone is blind or crippled, he can understand in one way or another. The blind have ears. Your picture of the ladder is very good. You can explain this knowledge to anyone and make them worthy of going to heaven. The soul can claim his inheritance from the Father. The soul can go to heaven. Perhaps the organs would be defective. There is no one lame or crippled there. There, both the soul and body are pure. Matter is also pure. New things are definitely satopradhan. This drama is predestined. One second cannot be the same as the next. There cannot be two seconds that are the same; there is always a little difference. You have to understand such a drama exactly as it is as a detached observer. You receive this knowledge at this time and you will not receive it again. Previously, you didn’t have this knowledge. This is called the eternal and imperishable predestined drama. Understand it well, imbibe it and explain it to others. Only you Brahmins know this knowledge. You are receiving the powerful medicine that gives strength. Anything that is the best of all is praised. You also know, numberwise, how the new world is established and what that kingdom will then be like. Those who know this can also explain to others. You have a lot of happiness. Some don’t have happiness worth even a penny. Each one has his own part. Those in whose intellects this sits and who churn the ocean of knowledge can also explain to others. This is your study and that is what you become. You can explain to anyone: You are a soul. It is the soul that remembers the Supreme Soul. All souls are brothers. It is said: God is One. All human beings have a soul in them. The parlokik Father of all souls is One. No one can make those whose intellects have firm faith change their minds. They would quickly make weak ones change their minds. They have so many debates about the notion of omnipresence. They too are very firm in their own knowledge. It is possible that they don’t belong to our religion. How can you say that they belong to the deity religion? The original eternal deity religion has disappeared. You children know that those of your original eternal deity religion belonged to the pure family path. It has now become impure. Those who were at first worthy of worship have now become worshippers. If you have learnt many points, you are able to explain to many others. The Father explains to you and you then have to explain to others how the world cycle turns. No one else apart from you knows this. You, too, are numberwise. Baba also has to repeat the points again and again because new ones come. They ask you how establishment took place in the beginning and you would then have to repeat that. You will remain very busy. You can also explain using the pictures. However, not everyone is able to imbibe knowledge to the same extent. Here, you need knowledge, you need remembrance and you need very good dharna. You definitely have to remember the Father in order to become satopradhan. Some children remain trapped in their own business. They don’t make any effort at all. This too is fixed in the drama. However much effort each of you made in the previous cycle, you will make the same effort again. At the end, you have to live as brothers. You came bodiless and you have to return bodiless. It should not be that you remember someone at the end. No one can go back yet. How could anyone go to heaven before destruction takes place? They would surely either go to the subtle region or take another birth here. They would make effort to remove whatever weaknesses still remain. However, they would only be able to understand when they grow older. This is all fixed in the drama. Only at the end will you have a constant stage. It isn’t that when you write down everything, you would remember it all. So, why are there so many books in the libraries etc? Doctors and lawyers keep many books; they continue to study them. There, human beings are lawyers for human beings. You souls become lawyers for souls. You souls are teaching souls. That is a worldly study whereas this is the spiritual study. Through this spiritual study, you will not make any mistakes for 21 births. Many mistakes are made in the kingdom of Ravan due to which you will have to tolerate a lot. Those who don’t study fully and don’t attain their karmateet stage will have to tolerate punishment. Then, their status would also be reduced. Only when you churn the ocean of knowledge and continue to reply to others would you think about these things. You children know that the Father whose Shiva Jayanti is being celebrated also came in the previous cycle. There was no question of any battle etc. All of those things are from the scriptures. This is a study. There is happiness in earning. Those who earn a hundred thousand have greater happiness. Some are millionaires whereas others have little money. However many jewels of knowledge some have, they have that much happiness. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.
Essence for Dharna:
1. Churn the ocean of knowledge and fill yourself with jewels of knowledge.Understand the secrets of the drama very well and also explain them to others. Don’t have any regrets about anything but remain constantly cheerful.
2. You have to make your stage constant and stable over a long period of time so that, at the end, you remember no one except the one Father. Practise being brothers and that you are now going back home.
Blessing:
May you be double light and remain detached and loving like a lotus by handing over everything to the Father.
To belong to the Father means to give all your burdens to the Father. To be double light means to hand over everything to the Father. “Even this body is not mine”. Since even that body does not belong to you, what else remains? All of you have made a promise: This body is Yours, the mind is Yours and all the wealth is Yours. Since everything belongs to the Father, how can there be any burdens? Therefore, keep the example of the lotus in your awareness and remain constantly loving and detached and you will become double light.
Slogan:
True Pandavas are those who finish bossiness and who melt away all their awareness of the body with spirituality.

Thursday, 14 February 2019

February 14, 2019

BK murli today 15/02/2019 (Hindi) Brahma Kumaris Murli प्रातः मुरली Om Shanti.Shiv baba ke Mahavakya

 BK Murli Today 15 February 2019 Hindi


"मीठे बच्चे - अब तक जो कुछ पढ़ा है वह सब भूल जाओ, एकदम बचपन में चले जाओ तब इस रूहानी पढ़ाई में पास हो सकेंगे''

प्रश्नः-
जिन बच्चों को दिव्य बुद्धि मिली है, उनकी निशानी क्या होगी?

उत्तर:-
वे बच्चे इस पुरानी दुनिया को इन ऑखों से देखते हुए भी नहीं देखेंगे। उनकी बुद्धि में सदा रहता है कि यह पुरानी दुनिया ख़त्म हुई कि हुई। यह शरीर भी पुराना तमोप्रधान है तो आत्मा भी तमोप्रधान है, इनसे क्या प्रीत करें। ऐसे दिव्य बुद्धि वाले बच्चों से ही बाप की भी दिल लगती है। ऐसे बच्चे ही बाप की याद में निरन्तर रह सकते हैं। सेवा में भी आगे जा सकते हैं।
 BK Murli Today 15 February 2019 Hindi 



ओम् शान्ति।  मीठे-मीठे रूहानी बच्चों को रूहानी बाप समझाते हैं। जैसे हद के सन्यासी हैं, वह घरबार छोड़ देते हैं क्योंकि वह समझते हैं हम ब्रह्म में लीन हो जायेंगे, इसलिए दुनिया से आसक्ति छोड़नी चाहिए। अभ्यास भी ऐसे करते होंगे। जाकर एकान्त में रहते हैं। वह हैं हठयोगी, तत्व ज्ञानी। समझते हैं ब्रह्म में लीन हो जायेंगे इसलिए ममत्व मिटाने के लिए घरबार को छोड़ देते हैं। वैराग्य आ जाता है। परन्तु फट से ममत्व नहीं मिटता। स्त्री, बच्चे आदि याद आते रहते हैं। यहाँ तो तुमको ज्ञान की बुद्धि से सब-कुछ भुलाना होता है। कोई भी चीज जल्दी नहीं भूलती। अभी तुम यह बेहद का सन्यास करते हो। याद तो सब सन्यासियों को भी रहती है। परन्तु बुद्धि से समझते हैं हमको ब्रह्म में लीन होना है, इसलिए हमको देह भान नहीं रखना है। वह है हठयोग मार्ग। समझते हैं हम यह शरीर छोड़ ब्रह्म में लीन हो जायेंगे। उनको यह पता ही नहीं कि हम शान्तिधाम में कैसे जा सकते। तुम अब जानते हो हमको अपने घर जाना है। जैसे विलायत से आते हैं तो समझते हैं हमको बाम्बे जाना है वाया....।

अभी तुम बच्चों को भी पक्का निश्चय है। बहुत कहते हैं इनकी पवित्रता अच्छी है, ज्ञान अच्छा है, संस्था अच्छी है। मातायें मेहनत अच्छी करती हैं क्योंकि अथक हो समझाती हैं। अपना तन-मन-धन लगाती हैं इसलिए अच्छी लगती हैं। परन्तु हम भी ऐसा अभ्यास करें, यह ख्याल भी नहीं आयेगा। कोई विरला निकलता है। वह तो बाप भी कहते हैं कोटों में कोई अर्थात् जो तुम्हारे पास आते हैं, उनमें से कोई निकलता है। बाकी यह पुरानी दुनिया ख़त्म होने वाली है। तुम जानते हो अब बाप आया हुआ है। साक्षात्कार हो न हो, विवेक कहता है बेहद का बाप आये हैं। यह भी तुम जानते हो बाप एक है, वही पारलौकिक बाप ज्ञान का सागर है। लौकिक को कभी ज्ञान का सागर नहीं कहेंगे। यह भी बाप ही आकर तुम बच्चों को अपना परिचय देते हैं। तुम जानते हो अब पुरानी दुनिया ख़त्म होने वाली है। हमने 84 जन्मों का चक्र पूरा किया। अभी हम पुरुषार्थ करते हैं वापिस सुखधाम जाने का वाया शान्तिधाम। शान्तिधाम तो जरूर जाना है। वहाँ से फिर यहाँ वापिस आना है। मनुष्य तो इन बातों में मूँझे हुए हैं। कोई मरता है तो समझते हैं वैकुण्ठ गया। परन्तु वैकुण्ठ है कहाँ? यह वैकुण्ठ का नाम तो भारतवासी ही जानते हैं और धर्म वाले जानते ही नहीं। सिर्फ नाम सुना है, चित्र देखे हैं। देवताओं के मन्दिर आदि बहुत देखे हैं। जैसे यह देलवाड़ा मन्दिर है। लाखों-करोड़ों रूपया खर्चा करके बनाया है, बनाते ही रहते हैं।

देवी-देवताओं को वैष्णव कहेंगे। वे विष्णु की वंशावली हैं। वो तो हैं ही पवित्र। सतयुग को कहा जाता है पावन दुनिया। यह है पतित दुनिया। सतयुग के वैभव आदि यहाँ होते नहीं। यहाँ तो अनाज आदि सब तमोप्रधान बन जाते हैं। स्वाद भी तमोप्रधान। बच्चियाँ ध्यान में जाती हैं, कहती हैं हम शूबीरस पीकर आई। बहुत स्वाद था। यहाँ भी तुम्हारे हाथ का खाते हैं तो कहते हैं बहुत स्वाद है क्योंकि तुम अच्छी रीति बनाती हो। सब दिल भरकर के खाते हैं। ऐसे नहीं, तुम योग में रहकर बनाते हो तब स्वादिष्ट होता है! नहीं, यह भी प्रैक्टिस होती है। कोई बहुत अच्छा भोजन बनाते हैं। वहाँ तो हर चीज सतोप्रधान होती है, इसलिए बहुत त़ाकत रहती है। तमोप्रधान होने से त़ाकत कम हो जाती है, फिर उनसे बीमारियाँ दु:ख आदि भी होता रहता है। नाम ही है दु:खधाम। सुखधाम में दु:ख की बात ही नहीं। हम इतने सुख में जाते हैं, जिसको स्वर्ग का सुख कहा जाता है। सिर्फ तुमको पवित्र बनना है, सो भी इस जन्म के लिए। पीछे का ख्याल मत करो, अभी तो तुम पवित्र बनो। पहले तो विचार करो - कहते कौन हैं! बेहद के बाप का परिचय देना पड़े। बेहद के बाप से सुख का वर्सा मिलता है।

लौकिक बाप भी पारलौकिक बाप को याद करते हैं। बुद्धि ऊपर चली जाती है। तुम बच्चे जो निश्चयबुद्धि पक्के हो, उन्हों के अन्दर रहेगा कि इस दुनिया में हम बाकी थोड़े दिन हैं। यह तो कौड़ी मिसल शरीर है। आत्मा भी कौड़ी मिसल बन पड़ी है, इसको वैराग्य कहा जाता है।अभी तुम बच्चे ड्रामा को जान चुके हो। भक्ति मार्ग का पार्ट चलना ही है। सब भक्ति में हैं, ऩफरत की दरकार नहीं। सन्यासी खुद ऩफरत दिलाते हैं। घर में सब दु:खी हो जाते हैं, वह खुद अपने को जाकर थोड़ा सुखी करते हैं। वापिस मुक्ति में कोई जा नहीं सकते। जो भी कोई आये हैं, वापिस कोई भी गया नहीं है। सब यहाँ ही हैं। एक भी निर्वाणधाम वा ब्रह्म में नहीं गया है। वह समझते हैं फलाना ब्रह्म में लीन हो गया। यह सब भक्ति मार्ग के शास्त्रों में है। बाप कहते हैं इन शास्त्रों आदि में जो कुछ है, सब भक्तिमार्ग है। तुम बच्चों को अभी ज्ञान मिल रहा है इसलिए तुम्हें कुछ भी पढ़ने की दरकार नहीं है। परन्तु कोई-कोई ऐसे हैं जिनमें फिर नॉविल्स आदि पढ़ने की आदत है। ज्ञान तो पूरा है नहीं। उन्हें कहा जाता है कुक्कड़ ज्ञानी। रात को नॉविल पढ़कर नींद करते हैं तो उनकी गति क्या होगी? यहाँ तो बाप कहते हैं जो कुछ पढ़े हो सब भूल जाओ। इस रूहानी पढ़ाई में लग जाओ। यह तो भगवान् पढ़ाते हैं, जिससे तुम देवता बन जायेंगे, 21जन्मों के लिए। बाकी जो कुछ पढ़े हो वह सब भुलाना पड़े। एकदम बचपन में चले जाओ।

अपने को आत्मा समझो। भल इन ऑखों से देखते हो परन्तु देखते भी नहीं देखो। तुम्हें दिव्य दृष्टि, दिव्य बुद्धि मिली है तो समझते हो यह सारी पुरानी दुनिया है। यह ख़त्म हो जानी है। यह सब कब्रिस्तानी हैं, उनसे क्या दिल लगायेंगे। अभी परिस्तानी बनना है। तुम अब कब्रिस्तान और परिस्तान के बीच में बैठे हो। परिस्तान अभी बन रहा है। अभी बैठे हैं पुरानी दुनिया में। परन्तु बीच में बुद्धि का योग वहाँ चला गया है। तुम पुरुषार्थ ही नई दुनिया के लिए कर रहे हो। अभी बीच में बैठे हो, पुरुषोत्तम बनने के लिए। इस पुरुषोत्तम संगमयुग का भी किसको पता नहीं है। पुरुषोत्तम मास, पुरुषोत्तम वर्ष का भी अर्थ नहीं समझते। पुरुषोत्तम संगमयुग को टाइम बहुत थोड़ा मिला हुआ है। देरी से युनिवर्सिटी में आयेंगे तो बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। याद बहुत मुश्किल ठहरती है, माया विघ्न डालती रहती है। तो बाप समझाते हैं यह पुरानी दुनिया ख़त्म होने वाली है। बाप भल यहाँ बैठे हैं, देखते हैं परन्तु बुद्धि में है यह सब ख़त्म होने वाला है। कुछ भी रहेगा नहीं। यह तो पुरानी दुनिया है, इनसे वैराग्य हो जाता है। शरीरधारी भी सब पुराने हैं। शरीर पुराना तमोप्रधान है तो आत्मा भी तमोप्रधान है। ऐसी चीज़ को हम देखकर क्या करें। यह तो कुछ भी रहना नहीं है, उनसे प्रीत नहीं। बच्चों में भी बाप की दिल उनसे लगती है जो बाप को अच्छी रीति याद करते हैं और सर्विस करते हैं। बाकी बच्चे तो सब हैं। कितने ढेर बच्चे हैं। सब तो कभी देखेंगे भी नहीं। प्रजापिता ब्रह्मा को तो जानते ही नहीं हैं।

प्रजापिता ब्रह्मा का नाम तो सुना है परन्तु उनसे क्या मिलता है - यह कुछ भी पता नहीं है। ब्रह्मा का मन्दिर है, दाढ़ी वाला दिखाया है। परन्तु उनको कोई याद नहीं करता है क्योंकि उनसे वर्सा मिलना नहीं है। आत्माओं को वर्सा मिलता है एक लौकिक बाप से, दूसरा पारलौकिक बाप से। प्रजापिता ब्रह्मा को तो कोई जानते ही नहीं। यह है वन्डरफुल। बाप होकर वर्सा न दे तो अलौकिक ठहरा ना। वर्सा होता ही है हद का और बेहद का। बीच में वर्सा होता नहीं। भल प्रजापिता कहते हैं परन्तु वर्सा कुछ भी नहीं। इस अलौकिक बाप को भी वर्सा पारलौकिक से मिलता है तो यह फिर देंगे कैसे! पारलौकिक बाप इनके थ्रू देता है। यह है रथ। इनको क्या याद करना है। इनको खुद भी उस बाप को याद करना पड़ता है। वह लोग समझते हैं यह ब्रह्मा को ही परमात्मा समझते हैं। परन्तु हमको वर्सा इनसे नहीं मिलता है, वर्सा तो शिवबाबा से मिलता है। यह तो बीच में दलाल रूप है। यह भी हमारे जैसा स्टूडेण्ट है। डरने की कोई बात नहीं।बाप कहते हैं इस समय सारी दुनिया तमोप्रधान है। तुमको योगबल से सतोप्रधान बनना है। लौकिक बाप से हद का वर्सा मिलता है। तुमको अब बुद्धि लगानी है बेहद में। बाप कहते हैं सिवाए बाप से और किससे भी कुछ मिलना नहीं है, फिर भल देवतायें क्यों न हों। इस समय तो सब तमोप्रधान हैं। लौकिक बाप से वर्सा तो मिलता ही है। बाकी इन लक्ष्मी-नारायण से तुम क्या चाहते हो? वह लोग तो समझते हैं यह अमर हैं, कभी मरते नहीं हैं। तमोप्रधान बनते नहीं हैं। लेकिन तुम जानते हो जो सतोप्रधान थे वही तमोप्रधान में आते हैं। श्री कृष्ण को लक्ष्मी-नारायण से भी ऊंच समझते हैं क्योंकि वे फिर भी शादी किये हुए हैं। कृष्ण तो जन्म से ही पवित्र है इसलिए कृष्ण की बहुत महिमा है। झूला भी कृष्ण को झुलाते हैं। जयन्ती भी कृष्ण की मनाते हैं। लक्ष्मी-नारायण की क्यों नहीं मनाते हैं? ज्ञान न होने के कारण कृष्ण को द्वापर में ले गये हैं। कहते हैं गीता ज्ञान द्वापर युग में दिया है। कितना कठिन है किसको समझाना! कह देते हैं ज्ञान तो परम्परा से चला आ रहा है। परन्तु परम्परा भी कब से? यह कोई नहीं जानते।

पूजा कब से शुरू हुई यह भी नहीं जानते हैं इसलिए कह देते रचता और सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त को नहीं जानते हैं। कल्प की आयु लाखों वर्ष कहने से परम्परा कह देते हैं। तिथि-तारीख कुछ भी नहीं जानते। लक्ष्मी-नारायण का भी जन्म दिन नहीं मनाते। इसको कहा जाता है अज्ञान अंधियारा। तुम्हारे में भी कोई यथार्थ रीति इन बातों को जानते नहीं। तब तो कहा जाता है - महारथी, घोड़ेसवार और प्यादे। गज को ग्राह ने खाया। ग्राह बड़े होते हैं, एकदम हप कर लेते हैं। जैसे सर्प मेढ़क को हप करते हैं।भगवान् को बागवान, माली, खिवैया क्यों कहते हैं? यह भी तुम अभी समझते हो। बाप आकर विषय सागर से पार ले जाते हैं, तब तो कहते हैं नैया मेरी पार लगा दो। तुमको भी अभी पता पड़ा है कि हम कैसे पार जा रहे हैं। बाबा हमको क्षीर सागर में ले जाते हैं। वहाँ दु:ख-दर्द की बात नहीं। तुम सुनकर औरों को भी कहते हो कि नैया को पार करने वाला खिवैया कहते हैं - हे बच्चे, तुम सब अपने को आत्मा समझो। तुम पहले क्षीरसागर में थे, अब विषय सागर में आ पहुँचे हो। पहले तुम देवता थे। स्वर्ग है वण्डर ऑफ वर्ल्ड। सारी दुनिया में रूहानी वण्डर है स्वर्ग। नाम सुनकर ही खुशी होती है। हेविन में तुम रहते हो। यहाँ 7 वण्डर्स दिखाते हैं। ताजमहल को भी वण्डर कहते हैं परन्तु उसमें रहने का थोड़ेही है। तुम तो वण्डर ऑफ वर्ल्ड का मालिक बनते हो। तुम्हारे रहने के लिए बाप ने कितना वण्डरफुल वैकुण्ठ बनाया है, 21 जन्मों के लिए पद्मापद्मपति बनते हो। तो तुम बच्चों को कितनी खुशी होनी चाहिए। हम उस पार जा रहे हैं। अनेक बार तुम बच्चे स्वर्ग में गये होंगे। यह चक्र तुम लगाते ही रहते हो। पुरुषार्थ ऐसा करना चाहिए जो नई दुनिया में हम पहले-पहले आयें। पुराने मकान में जाने की दिल थोड़ेही होती है। बाबा ज़ोर देते हैं पुरुषार्थ कर नई दुनिया में जाओ। बाबा हमें वण्डर ऑफ वर्ल्ड का मालिक बनाते हैं। तो ऐसे बाप को हम क्यों नहीं याद करेंगे। बहुत मेहनत करनी है। इसको देखते भी नहीं देखो। बाप कहते हैं भल मैं देखता हूँ, परन्तु मेरे में ज्ञान है - मैं थोड़े रोज़ का मुसाफिर हूँ। वैसे तुम भी यहाँ पार्ट बजाने आये हो इसलिए इससे ममत्व निकाल दो। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-

1) रूहानी पढ़ाई में सदा बिजी रहना है। कभी भी नॉवेल्स आदि पढ़ने की गंदी आदत नहीं डालनी है, अब तक जो कुछ पढ़ा है उसे भूल बाप को याद करना है।

2) इस पुरानी दुनिया में स्वयं को मेहमान समझकर रहना है। इससे प्रीत नहीं रखनी है, देखते भी नहीं देखना है।

वरदान:-
अधिकारी बन समस्याओं को खेल-खेल में पार करने वाले हीरो पार्टधारी भवचाहे कैसी भी परिस्थितियां हों, समस्यायें हों लेकिन समस्याओं के अधीन नहीं, अधिकारी बन समस्याओं को ऐसे पार कर लो जैसे खेल-खेल में पार कर रहे हैं। चाहे बाहर से रोने का भी पार्ट हो लेकिन अन्दर हो कि यह सब खेल है - जिसको कहते हैं ड्रामा और ड्रामा के हम हीरो पार्ट-धारी हैं। हीरो पार्टधारी अर्थात् एक्यूरेट पार्ट बजाने वाले इसलिए कड़ी समस्या को भी खेल समझ हल्का बना दो, कोई भी बोझ न हो।

स्लोगन:-

सदा ज्ञान के सिमरण में रहो तो सदा हर्षित रहेंगे, माया की आकर्षण से बच जायेंगे।
February 14, 2019

BK murli today 15/02/2019 (English) Brahma Kumaris Murli प्रातः मुरली Om Shanti.Shiv baba ke Mahavakya

 BK Murli Today 15 February 2019 English


15/02/2019 Morning Murli Om Shanti BapDada Madhuban


Sweet children, forget whatever you have studied up to now. Go right back to your childhood, for only then will you be able to pass this spiritual study.
Question:
What are the signs of the children who have received divine intellects?
Answer:
While seeing this old world with their physical eyes, they don’t see it. It is always in their intellects that this old world is now about to end, that bodies are old and tamopradhan and that souls too are tamopradhan, so why should we have lovve for them? The Father’s heart is connected to the children who have such divine intellects. Only such children can stay in constant remembrance of the Father and can also go ahead in service.
 BK Murli Today 15 February 2019 English

Om Shanti
The spiritual Father explains to the sweetest, spiritual children. Limited sannyasis renounce their homes and families because they believe that they will merge into the brahm element, and that is why they believe they should renounce their attraction to the world. That is what they continue to practise. They go and stay in solitude. They are hatha yogis with knowledge of the elements. They believe that they will merge into the brahm element. That is why they renounce their homes and families and end their attachment to them; they have disinterest. However, that attachment is not broken instantly; they continue to remember their wives and children etc. Here, you have to forget everything with an intellect of knowledge. Nothing is easily forgotten. You now have this unlimited renunciation. All the sannyasis have remembrance too, but their intellects believe that they will merge into the brahm element and that they therefore shouldn’t have any consciousness of the body. That is the path of hatha yoga. They believe that they will shed their bodies and merge into the brahm element. They don’t know how they can go to the land of peace. You now know that you have to go to your home. When people used to come from abroad, they understood that they had to come via Bombay. You children also now have firm faith. Many people say that your purity is good, that your knowledge is good and that your organization is good. The mothers work very hard because they explain tirelessly. They use their bodies, minds and wealth and this is why they are liked. However, those people would never have any thought of practising this themselves. Scarcely any emerge. Even the Father says that only a handful out of multimillions emerges, that is, the ones who come to you. However, this old world is going to end. You know that the Father has now come. Whether you have a vision or not, the conscience says that the unlimited Father has come. You also know that there is just the one Father. That parlokik Father is the Ocean of Knowledge. A physical father would never be called the Ocean of Knowledge. It is the Father who comes and gives you children His introduction. You know that this old world is now to end. We have completed the cycle of 84 births. We are now making effort to go back to the land of happiness via the land of peace. We definitely have to go to the land of peace. We then have to come back from there. People are confused by these things. When someone dies, people think that he has gone to Vaikunth (Paradise), but, where is Paradise? Only the people of Bharat know the name of Paradise. Those of other religions don’t know it. They have just heard the name and seen pictures of it. They have seen many temples of the deities, just like the Dilwala Temple. It was built at a cost of hundreds of thousands and millions of rupees. They continue to build them. Deities are called Vaishnavs; they belong to the dynasty of Vishnu. They are pure anyway. The golden age is called the pure world whereas this is the impure world. The comforts of the golden age don’t exist here. Here, all the grain etc., everything, has become tamopradhan. Its taste is also tamopradhan. When daughters go into trance, they come back, saying that they drank subiras (mango juice) and that it was very delicious. Here, too, when people eat food cooked by you, they say that it is very tasty because you make it well. Everyone eats to their heart’s content. It isn’t that it is tasty because you prepare it while in yoga; no. That is just practice. Some cook very well. There, everything is satopradhan and this is why it has a lot of strength. When it becomes tamopradhan, its strength is reduced, and then there are diseases and sorrow etc. from that. The very name is the land of sorrow. There is no question of sorrow in the land of happiness. We are going to a place where there is so much happiness that it is called the happiness of heaven. You simply have to become pure, and that is also for just this birth. Don’t think about the future. At least become pure now! First of all, think about who it is that is telling you this. You have to give the introduction of the unlimited Father. You receive the inheritance of happiness from the unlimited Father. Even your physical fathers remember the parlokik Father and their intellects go up above. You children, whose intellects have firm faith, feel inside you that you are going to be in this world for only a few more days. This body is like a shell. The soul has also become like a shell. This is called disinterest. You children now know the drama. The part of the path of devotion has to continue. All are engaged in devotion. There is no need to dislike it. Sannyasis make people dislike it. They all become unhappy at home. They don’t make themselves happy by going away. No one can go back into liberation. None of those who have come have been able to go back. All are here. Not a single person has gone to the land of nirvana or the brahm element. They think that so-and-so merged into the brahm element. All of that is in the scriptures of the path of devotion. The Father says: Whatever there is in all of those scriptures, that is the path of devotion. You children are now receiving knowledge and this is why there is no need for you to study anything. However, there are some who have the habit of reading novels etc. They don’t have full knowledge; they are called cockerel-gyani. They go to sleep at night reading novels, and so what would be their state? Here, the Father says: Forget everything you have studied. Engage yourself in this spiritual study. It is God who is teaching you this and through it you will become deities for 21 births. You have to forget everything you have studied so far. Go right back to your childhood. Consider yourselves to be souls. Although you see everything with those eyes, see but don’t see. You have received divine intellects and divine eyes and so you understand that this whole world is old, that it is now to end. Everything here is to turn into a graveyard, and so why should you attach your hearts to it? You now have to become those who belong to the land of angels. You are now sitting between the graveyard (kabristan) and the land of angels (paristhan). The land of angels is now being created. You are now sitting in the old world, but your intellects’ yoga has now gone there. You are making effort for the new world. You are now sitting in the middle in order to become the most elevated human beings. No one knows about this most auspicious confluence age. They don’t even understand the meaning of the auspicious month of charity or the auspicious year. The most auspicious confluence age has a very short duration. If you join a university later, you have to make a lot of effort. Remembrance is hardly able to stay in some; Maya continues to cause obstacles. The Father explains: This old world is going to end. Although the Father is sitting here and you are seeing everything, your intellects are aware that all of this is going to end. Nothing will remain. This is the old world and you have disinterest in it. All bodily beings are also old. Bodies are old and tamopradhan and souls are tamopradhan. What should we do seeing such things? None of this will remain, so we have no love for them. The Father’s heart is touched by the children who remember the Father very well and who do service. However, all are children anyway. There are so many children; not everyone will see Him. They don’t even know Prajapita Brahma. They have heard the name Prajapita Brahma, but they don’t know what they would receive from him. There is the temple to Brahma; they have portrayed him with a beard. However, no one remembers him because you do not receive the inheritance from him. Souls receive an inheritance from their physical fathers and from the parlokik Father. No one even knows Prajapita Brahma. This is wonderful. Being a father who doesn’t give you an inheritance, he must be alokik, must he not? There is a limited inheritance and the unlimited inheritance. There is no other inheritance in between. Although he is called Prajapita, there is no inheritance from him. This alokik father also receives his inheritance from the parlokik Father and so how could he give the inheritance? The parlokik Father gives it through him. He is the chariot. Why should you remember him? He himself has to remember that Father. Those people think that you consider Brahma to be God. Tell them: We don’t receive the inheritance from him; we receive the inheritance from Shiv Baba. This one is the agent in between. He too is a student like us. There is no question of fear. The Father says: At this time, the whole world is tamopradhan. You have to become satopradhan with the power of yoga. You receive a limited inheritance from your physical father. You now have to connect your intellects to the unlimited. The Father says: You are not going to receive anything from anyone except the one Father, not even from the deities. At this time, all are tamopradhan. You receive an inheritance from your physical fathers anyway. So, what do you want from this Lakshmi and Narayan? Those people think that they are immortal and that they never die, that they never become tamopradhan. However, you know that those who were satopradhan then went into the tamopradhan stage. Shri Krishna is considered to be even more elevated than Lakshmi and Narayan because they are a married couple. Krishna is pure from birth and this is why there is a lot of praise of Krishna. They rock Krishna in a cradle. They also celebrate the birthday of Krishna. Why do they not celebrate the birthdays of Lakshmi and Narayan? Because of not having knowledge, they have shown Krishna in the copper age. They say that the knowledge of the Gita was given in the copper age. It is so difficult to explain to anyone! They say that knowledge has continued from time immemorial. However, from when is it time immemorial? No one knows this. They don’t even know when they began worshipping and this is why they say that they don’t know the Creator or the beginning, middle and end of the world. Because of saying that the duration of the cycle is hundreds of thousands of years, they speak of time immemorial; they don’t know the time or date at all. They don’t celebrate the birthdays of Lakshmi or Narayan. That is called the darkness of ignorance. There are some of you, too, who don’t understand these things accurately. This is why it is said: Elephant riders, horse riders and infantry. The alligator ate the elephant. The alligator is big and he completely swallows you, just as a snake swallows a frog. Why is God called the Master of the Garden, the Gardener and the Boatman? You understand that at this time. The Father comes and takes you across the ocean of poison. He takes you across and this is why you say: Take my boat across. You now know how you go across. Baba is taking us to the ocean of milk. There is no question of pain or sorrow there. You hear this and tell others that the Boatman who takes our boat across tells us: Children, consider yourselves to be souls. Previously, you were in the ocean of milk and you have now reached the ocean of poison. At first, you were deities. Heaven is the wonder of the world. The spiritual wonder of the whole world is heaven. Just hearing its name, you become happy. You stay in heaven. Here, they show the seven wonders. They call the Taj Mahal a wonder, but no one can live there. You are becoming the masters of the wonder of the world. The Father makes such a wonderful Paradise for you to live in. You become multimillionaires for 21 births. So, you children should be so happy that you are going across to the other side. You children must have gone to heaven many times. You continue to go around this cycle. You should make such effort that you go into the new world first. You would not feel like going to an old house. Baba emphasizes that you to have to make effort to go to the new world. Baba is making us into the masters of the wonder of the world. So, why would we not remember such a Father? You have to make a lot of effort. See this world but don’t see it. The Father says: Although I see everything, I have the knowledge that I am the Traveller for only a few days. Similarly, you too have come here just to play your parts. Therefore, remove your attachment from it. Achcha.

To the sweetest, beloved, long-lost and now-found children, love, remembrance and good morning from the Mother, the Father, BapDada. The spiritual Father says namaste to the spiritual children.
Essence for Dharna:
1. Always remain busy in the spiritual study. Do not instil any bad habits like reading novels etc. Forget whatever you have studied up to now and remember the Father.
2. Live in this old world considering yourself to be a guest. Do not have any love for it. See it but don’t see it.
Blessing:
May you be a hero actor with all rights and overcome all problems as though you are playing games.
No matter what the situations or the problems are, do not be controlled by the problems, but have all rights and overcome the problems in such a way as when you play games. Externally, you may have a part of crying, but you should feel inside all of it to be a game which is called the drama and that we are hero actors in this drama. Hero actors means those who play accurate parts. Therefore, consider any big problem to be a game and make it light, do not have any burdens.
Slogan:
Constantly churn knowledge and you will always remain cheerful and be saved from Maya’s attractions.


Wednesday, 13 February 2019

February 13, 2019

BK murli today 14/02/2019 (Hindi) Brahma Kumaris Murli प्रातः मुरली Om Shanti.Shiv baba ke Mahavakya

 BK Murli Today 14 February 2019 Hindi


14/02/2019 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

"मीठे बच्चे - भारतवासियों को सिद्धकर बताओ कि शिव जयन्ती ही गीता जयन्ती हैगीता से फिर होती है श्रीकृष्ण जयन्ती''
प्रश्नः-
किसी भी धर्म की स्थापना का मुख्य आधार क्या हैधर्म स्थापक कौन-सा कार्य नहीं करते जो बाप करते हैं?
उत्तर:-
किसी भी धर्म की स्थापना के लिए पवित्रता का बल चाहिए। सभी धर्म पवित्रता के बल से स्थापन हुए। लेकिन कोई भी धर्म स्थापक किसी को पावन नहीं बनाते क्योंकि जब धर्म स्थापन होते हैं तब माया का राज्य हैसबको पतित बनना ही है। पतितों को पावन बनाना - यह बाप का ही काम है। वही पावन बनने की श्रीमत देते हैं।
 BK Murli Today 14 February 2019 Hindi 


ओम् शान्ति।
अब बच्चों ने समझ लिया है कि पाप की दुनिया किसको और पुण्य की दुनिया अथवा पावन दुनिया किसको कहा जाता है। वास्तव में पाप की दुनिया यह भारत ही है और भारत ही फिर पुण्य की दुनिया स्वर्ग बनता है। भारत ही बहिश्त था,भारत ही दोज़क बना है क्योंकि काम चिता पर जलते रहते हैं। वहाँ काम चिता पर कोई जलता नहींवहाँ काम चिता है ही नहीं। ऐसे भी नहीं कहेंगे कि सतयुग में काम चिता हैयह समझने की बातें हैं ना। पहले-पहले प्रश्न उठता है भारत जो पतित-दु:खी है सो वही भारत पावन-सुखी था जरूर। कहते भी हैं आदि सनातन हिन्दू धर्म था। अब आदि सनातन किसको कहा जाता हैआदि माना क्या और सनातन माना क्याआदि माना सतयुग। तो सतयुग में कौन थेयह तो सबको मालूम है कि लक्ष्मी-नारायण थे। जरूर वे भी किसकी सन्तान होंगे जो फिर सतयुग के मालिक बनें। सतयुग स्थापन करने वाला था परमपिता परमात्माउनकी सन्तान थे। परन्तु इस समय अपने को उनकी सन्तान नहीं समझते। अगर सन्तान समझते तो बाप को जानतेबाप को तो जानते ही नहीं। अब हिन्दू धर्म तो गीता में है नहीं। गीता में तो भारत नाम पड़ा है वह कहलाते हैं हिन्दू महासभा। अब श्रीमत भगवत गीता है सर्वशास्त्रमई शिरोमणी। गीता जयन्ती भी मनाई जाती हैशिव जयन्ती भी मनाई जाती है। अब शिव जयन्ती कब हुई है - यह भी मालूम होना चाहिए। फिर है कृष्ण जयन्ती। अभी तुम बच्चे जान चुके हो कि शिव जयन्ती के बाद है गीता जयन्ती। गीता जयन्ती के बाद है कृष्ण जयन्ती। गीता जयन्ती से ही देवी-देवता धर्म की स्थापना होती है। फिर गीता जयन्ती के साथ महाभारत का भी कनेक्शन है। उसमें फिर आती है युद्ध की बात। दिखाते हैं युद्ध के मैदान में सेनायें थी। यादवकौरव और पाण्डव दिखाते हैं। यादव मूसल निकालते हैं। वहाँ शराब पिया और मूसल निकाले। तुम जानते हो अभी बरोबर मूसल भी निकल रहे हैं। वह भी अपने कुल का विनाश करने एक-दूसरे को धमकी दे रहे हैं। सब क्रिश्चियन लोग हैं। वही यूरोपवासी यादव ठहरे। तो एक है उन्हों की सभा। उनका विनाश हुआ,आपस में लड़ मरे। उसमें सारा यूरोप आ गया। उसमें इस्लामीबौद्धीक्रिश्चियन सब आ जाते हैं। यहाँ फिर है कौरव और पाण्डव। कौरव भी विनाश को प्राप्त हुए और विजय पाण्डवों की हुई। अब प्रश्न उठता है गीता का भगवान् कौन,जिसने सहज योग और सहज ज्ञान सिखलाकर राजाओं का राजा बनाया अथवा पावन दुनिया स्थापन कीक्या श्रीकृष्ण आयाकौरव तो कलियुग में थे। कौरव-पाण्डवों के समय श्रीकृष्ण कैसे आ सकताश्रीकृष्ण जयन्ती मनाते हैं,सतयुग आदि में 16 कला। श्रीकृष्ण के बाद फिर त्रेता में 14 कला राम की। कृष्ण है राजाओं का राजा अथवा प्रिन्स का प्रिन्स। विकारी प्रिन्स लोग भी श्रीकृष्ण को पूजते हैं क्योंकि जानते हैं वह सतयुग का 16 कला सम्पूर्ण प्रिन्स थाहम विकारी हैं। जरूर प्रिन्स लोग भी ऐसे कहेंगे ना। अब फिर शिव जयन्ती भी हैमन्दिर भी बड़े से बड़ा उनका ही बना हुआ है। वह है निराकार शिव का मन्दिर। उनको ही परमपिता परमात्मा कहेंगे। ब्रह्मा-विष्णु-शंकर भी देवता ही ठहरे। 

शिव जयन्ती भारत में ही मनाई जाती है। अब देखो शिव जयन्ती आने वाली है। सिद्धकर समझाना है शिव को ही कहा जाता है ज्ञान का सागर अर्थात् सृष्टि को पावन करने वाला परमपिता परमात्मा। गांधी भी गाते थेकृष्ण का नाम नहीं लेते थे। अब प्रश्न उठता है शिव जयन्ती सो गीता जयन्ती या कृष्ण जयन्ती सो गीता जयन्तीअब कृष्ण जयन्ती तो सतयुग में कहेंगे। शिव की जयन्ती कब हुई थी - किसको पता नहीं। शिव तो है निराकार परमपिता परमात्माउसने सृष्टि रची संगम पर। सतयुग में था श्रीकृष्ण का राज्य। तो जरूर पहले शिव जयन्ती होगी। बच्चे जो ब्राह्मण कुल भूषण सर्विस में तत्पर रहते हैं उन्हों को यह बातें बुद्धि में लानी हैं कि भारतवासियों को कैसे सिद्धकर बतायें कि शिवजयन्ती सो गीता जयन्ती। फिर गीता से होती है कृष्ण जयन्ती अथवा राजाओं के राजा की जयन्ती। कृष्ण है पावन दुनिया का राजा। वहाँ तो है राजाई। वहाँ श्रीकृष्ण ने जन्म लेकर गीता तो गाई नहीं और सतयुग में महाभारत लड़ाई आदि तो हो नहीं सकती। वह जरूर संगम पर हुई होगी। तुम बच्चों को अच्छी तरह इन बातों पर समझाना है।

पाण्डव और कौरव सभा मशहूर है। पाण्डव पति दिखलाते हैं श्रीकृष्ण को। समझते हैं उसने सहज ज्ञान और सहज राजयोग सिखलाया। अब वास्तव में लड़ाई की तो कोई बात ही नहीं। विजय पाण्डवों की हुई हैजिन्हों को परमपिता परमात्मा ने सहज राजयोग सिखलाया। वही 21 जन्म सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी बन गये। तो पहले समझाना है,हिन्दू महासभा वालों को। सभायें तो और भी हैं - लोक सभाराज्य सभा। यह हिन्दू सभा है मुख्य। जैसे सेनायें गाई हुई हैं यादवकौरव और पाण्डव... और यह हुए भी संगम पर। अभी सतयुग की स्थापना हो रही है। कृष्ण के जन्म की तैयारी हो रही है। गीता जरूर संगम पर ही गाई है। अब संगम पर किसको लायेंकृष्ण तो आ न सकें। उनको क्या पड़ी है जो पावन दुनिया छोड़ पतित दुनिया में आये और कृष्ण तो है भी नहीं। तुम जानते हो अब वह 84वें जन्म में है कई लोग फिर समझते हैं श्रीकृष्ण हाज़िराहज़ूर है,सर्वव्यापी है। कृष्ण के भक्त कहेंगे यह सब कृष्ण ही कृष्ण हैं। कृष्ण ने यह रूप धरे हैं। राधे पंथी होंगे वह फिर कहेंगे राधे ही राधे... हम भी राधे,तुम भी राधे। अनेक मतें निकल पड़ी हैंकोई कहे ईश्वर सर्वव्यापीकोई कहे कृष्ण सर्वव्यापीकोई कहे राधे सर्वव्यापी। अब बाप तुम बच्चों को समझाते हैं। वह बाप वर्ल्ड ऑलमाइटी अथॉरिटी है तो अब तुम बच्चों को भी अथॉरिटी दे रहे हैं कि कैसे इन सबको समझायें। हिन्दू महासभा वालों को समझाओवह इन बातों को समझ सकेंगे। वह अपने को रिलीजस माइन्डेड मानते हैं। गवर्मेन्ट तो कोई धर्म को मानती नहीं। वह खुद ही मूंझ गये हैं। शिव परमात्मा है निराकार ज्ञान सागर और कोई को ज्ञान का सागर कह नहीं सकते। वह जब सम्मुख आकर ज्ञान देतब राजाई स्थापन हो। फिर तो बस राजाई स्थापन हो गई फिर सम्मुख तब आए जब राजाई गंवाओ। तो तुमको सिद्ध करना है शिव परमात्मा है निराकार ज्ञान सागरशिव जयन्ती सो गीता जयन्ती। इस पर नाटक बनाने हैंजो मनुष्यों की बुद्धि से कृष्ण की बात निकल जाये। निराकार शिव परमात्मा को ही पतित-पावन कहा जाता है। शास्त्र आदि जो भी बने हैं। वह सब मनुष्य मत परमनुष्यों ने बनाये हैं। बाबा का शास्त्र तो कोई है नहीं। बाप कहते हैं मैं सम्मुख आकर तुम बच्चों को बेगर टू प्रिन्स बनाता हूँ और फिर मैं चला जाता हूँ। यह नॉलेज मैं ही सम्मुख सुना सकता हूँ। वह गीता सुनाने वाले भल गीता सुनाते हैं परन्तु वहाँ भगवान् सम्मुख तो है नहीं। कहते हैं गीता का भगवान् सम्मुख था जो स्वर्ग बनाकर चला गया। तो क्या वह गीता सुनने से कोई मनुष्य स्वर्गवासी हो सकता हैमरने समय भी मनुष्यों को गीता सुनाते हैं और कोई शास्त्र नहीं सुनाते हैं। समझते हैं गीता से स्वर्ग की स्थापना हुई है इसलिए गीता ही सुनाते हैं। तो वह गीता एक होनी चाहिए ना। दूसरे धर्म सब पीछे आये हैं। और कोई कह नहीं सकते तुम स्वर्गवासी बनेंगे। फिर मनुष्यों को पिलाते भी गंगा जल हैजमुना जल नहीं पिलाते। गंगा जल का ही महत्व है। बहुत वैष्णव लोग जाते हैंमटके भरकर ले आते हैं। फिर उनमें से बूंद-बूंद डालकर पीते रहते कि सब रोग मिट जायें। वास्तव में है यह ज्ञान अमृत की धारा जिससे 21 जन्म के दु:ख मिट जाते हैं। तुम चैतन्य ज्ञान गंगाओं में स्नान करने से मनुष्य स्वर्गवासी बन जाते हैं। तो जरूर पिछाड़ी में ज्ञान गंगायें निकली होंगी। वह पानी की नदियां तो हैं ही हैं। ऐसे थोड़ेही कोई पानी पीने से देवता बन जायेंगे। यहाँ कोई थोड़ा ही ज्ञान सुनते हैं तो स्वर्ग के हकदार बन जाते हैं। यह है ज्ञान के सागर शिवबाबा की ज्ञान गंगायें। ज्ञान सागरगीता ज्ञान दाता एक शिव हैकृष्ण नहीं है। सतयुग में पतित कोई होता नहींजिसको ज्ञान दें। यह सब बातें भगवान् बैठ समझाते हैं। हे अर्जुन वा हे संजय.... नाम मशहूर हो गया है। लिखने में बहुत तीखा हैनिमित्त बना हुआ है। अब शिवजयन्ती आती है तो उस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखना है। शिव हो गया निराकार। उनको ज्ञान सागरब्लिसफुल कहा जाता है। कृष्ण को नॉलेजफुलब्लिसफुल नहीं कहेंगे। शिव परमात्मा ही नॉलेज देते हैंरहम करते हैं। नॉलेज ही रहम है। मास्टर रहम कर पढ़ाते हैं तो बैरिस्टर,इन्जीनियर आदि बन जाते है। सतयुग में ब्लिस की दरकार नहीं। तो पहले-पहले सिद्ध करना है कि निराकार ज्ञान सागर शिवजयन्ती सो गीता जयन्ती वा सतयुगी साकार कृष्ण जयन्ती सो गीता जयन्ती। यह है तुम बच्चों को सिद्ध करना।

तुम जानते हो जो भी पैगम्बर आदि आते हैं वह पावन नहीं बनाते। द्वापर से माया का राज्य होने से सब पतित हो जाते हैं। फिर जब तंग होते हैं तो चाहते हैं हम जायें। जो धर्म स्थापन करते हैं वही फिर वृद्धि को पाते हैं। पवित्रता के बल से धर्म स्थापन करते हैं फिर अपवित्र बनना ही है। मुख्य हैं धर्मइनसे ही वृद्धि होती है। टाल-टालियाँ निकलती हैं। शिव जयन्तीगीता जयन्ती सिद्ध होने से और सब शास्त्र उड़ जायेंगे क्योंकि वह हैं मनुष्यों के बनाये हुए। वास्तव में भारत का शास्त्र एक ही गीता है। मोस्ट बिलवेड बाप कितना सहज कर समझाते हैं। उनकी श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ मत है। अब तुमको यह सिद्ध करना है कि निराकार ज्ञान सागर जयन्ती सो गीता जयन्ती या सतयुगी साकार श्रीकृष्ण जयन्ती सो गीता जयन्तीइनके लिए बड़ी कान्फ्रेन्स बुलानी पड़े। यह बात सिद्ध हो जाये तो फिर सब पण्डित तुमसे आकर यह लक्ष्य लेंगे। शिव जयन्ती पर कुछ तो करना है ना। हिन्दू महासभा वालों का समझाओउनकी बड़ी संस्था है। सतयुग में है आदि सनातन देवी-देवता धर्म। बाकी सभा आदि कोई नहीं। सभायें हैं संगम पर। पहले-पहले तो सिद्ध करना है कि वास्तव में आदि सनातन सभा है यह ब्राह्मणों कीपाण्डवों की। पाण्डवों ने ही विजय पाई जो फिर स्वर्गवासी हुए। अब तो कोई आदि सनातन देवी-देवताओं की सभा कह न सके। देवताओं की सभा नहीं कहेंगेवह है सावरन्टी। कल्प के संगम पर यह सभायें थी। उनमें एक थी पाण्डव सभाजिसको आदि सनातन ब्राह्मणों की सभा कहेंगे। यह कोई नही जानते। कृष्ण के नाम से ब्राह्मण हैं नहीं। ब्राह्मणों की चोटी ब्रह्मा के नाम से है। ब्रह्मा के नाम से तुम ब्राह्मण सभा कहेंगे। यह बातें समझाने वाला भी बुद्धिवान चाहिए। इसमें ज्ञान की पराकाष्ठा चाहिए। निराकार शिव ही गीता ज्ञान दाता दिव्य चक्षु विधाता है। यह सब धारण कर फिर कान्फ्रेंस बुलाते हैंजो समझते हैं हम सिद्धकर बता सकेंगे उनको आपस में मिलना चाहिए। लड़ाई के मैदान में मेजर्सकमान्डर्स आदि की सभा होती है। यहाँ कमान्डर महारथी को कहा जाता है। बाबा क्रियेटरडायरेक्टर हैं,स्वर्ग की रचना करते हैं फिर डायरेक्शन देते हैं - महासभा बनाओ फिर इस बात को उठाओ। गीता का भगवान् सिद्ध होने से फिर सब समझेंगे कि उनसे योग लगाना चाहिए। बाबा कहते हैं मैं गाइड बनकर आया हूँतुम उड़ने लायक तो बनो। माया ने पंख तोड़ डाले हैं। योग लगाने से तुम्हारी आत्मा पवित्र हो जायेगी और उड़ेंगे। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।
धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) ज्ञान अमृत धारा से सबको निरोगी वा स्वर्गवासी बनाने की सेवा करनी है। मनुष्यों को देवता बनाना है। बाप समान मास्टर रहमदिल बनना है।
2) ज्ञान की पराकाष्ठा से बुद्धिवान बन शिवजयन्ती पर सिद्ध करना है कि शिव जयन्ती ही गीता जयन्ती हैगीता ज्ञान से ही श्रीकृष्ण का जन्म होता है।
वरदान:-
बाप के स्नेह को दिल में धारण कर सर्व आकर्षणों से मुक्त रहने वाले सच्चे स्नेही भव
बाप सभी बच्चों को एक जैसा स्नेह देते हैं लेकिन बच्चे अपनी शक्ति अनुसार स्नेह को धारण करते हैं। जो अमृतवेले के आदि समय पर बाप के स्नेह को धारण कर लेते हैंतो दिल में परमात्म स्नेह समाया होने के कारण और कोई स्नेह उन्हें आकर्षित नहीं करता। अगर दिल में पूरा स्नेह धारण नहीं करते तो दिल में जगह होने के कारण माया भिन्न-भिन्न रूप से अनेक स्नेह में आकर्षित कर लेती है इसलिए सच्चे स्नेही बन परमात्म प्यार से भरपूर रहो।
स्लोगन:-
देहदेह की पुरानी दुनिया और सम्बन्धों से ऊपर उड़ने वाले ही इन्द्रप्रस्थ निवासी हैं।